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बहुत से पर्यटक पुरी आते हैं पर चिल्का नहीं आकर यहाँ के रोमांच से वंचित रह जाते हैं। मेरा मन तो पुरी जाने से पहले ही चिल्का की गहराई में डुबकी लगा रहा था। पुरी के मंदिरों में घूमने के बाद हमारा अगला पड़ाव था झीलो की रानी चिल्का में।
पुरी से मात्र 55 किलोमीटर की दुरी हमने
ऑटो से तय की और पहुँच गए खारे
पानी के सबसे बड़े झील में। रास्ते में अनेक छोटे बड़े जलाशय हमारा स्वागत कर रहे थे। पशु पछियों की चिल्कारियाँ कानो में गूँज रही थी। ज्यो ही हमने आस पास नजर दौड़ाया, पाया की झील में नौका विहार करने की उत्तम व्यवस्था है। आस पास जलपान आदि के लिए रेस्टॉरेन्ट उपलब्ध थे जहाँ समुद्री भोजन का मजा भी आप उठा सकते हैं। अनेक मोटर चालित नौकाएं झील में तय की जाने वाले दुरी के अनुसार अलग अलग दरों पर उपलब्ध थे। हमने भी एक नौका सोलह सौ रूपये में दो घंटे के लिए बुक करवाया।
   सुबह के करीब ग्यारह बजे हम नौका में बैठ गए। ऐसा लगा मानो आज झील के रास्ते हम सागर से ही मिलने जा रहे हैं। पक्षियों की कलरव कानो में मधु घोल रही थी। धीरे धीरे हमारा सफ़र आगे बढ़ता चला गया।
जैसे जैसे आगे बढ़ते गए नए नए दृश्य आते गए।अचानक हवा में पक्षियों का एक समूह उड़ान भरता दिखाई पड़ा क्या मनमोहक छटा थी!
कहीं मछली पालन हो रहा था तो कहीं दूसरे नावों में बैठे लोग मस्ती कर रहे थे। लगभग बारह सौ वर्ग किमी में फैला यह एक विशाल झील था जहाँ सैकड़ो किमी दूर साइबेरिया से प्रवासी पक्षी यहाँ अपना ठिकाना बना लेते हैं। कुछ ही दुरी पर हमें इसी तरह के पक्षियों का एक झुण्ड हवा में उड़ान भर
   इधर उधर कुछ टापू भी थे जिनमे अनेक प्रकार के वन और जीव स्वच्छंद विचरण कर रहे थे। अचानक नौका चालक ने हमें पानी में क्रीड़ा करते हुए डॉल्फिनों की ओर इशारा किया।
अब हमें दूर से ही झील और समुद्र का मिलन दिखाई पड़ा। वहां हम एक टापू पर कुछ देर के लिए उतर गए। यहाँ का बालू बहुत ही सुनहरे रंग का था। हमने झील के मुहाने के पास जाने की इच्छा जताई तो चालक ने मना कर दिया क्योंकि वहां लहरें बहुत आक्रामक थी।
अब हमारा वापस जाने का वक़्त हो चला था। धीरे धीरे हम उस अद्भुत मुहाने से विदा हो गए। वापसी में हमें एक मंदिर भी दिखाई पड़ा पर हम वहां तक नहीं गए। अब हम आधे घंटे बाद किनारे आ गए और अपने छोटे से मस्तिष्क में इस विशाल जलाशय की यादो को समेट गए।























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