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पिछले पोस्ट में आपने काठमांडू और आस पास के नजारों को देखा। तीसरे दिन हम नेपाल के एक अन्य प्रमुख शहर पोखरा की ओर रवाना हुए। काठमांडू से पोखरा लगभग 150 किमी दूर है जिसे 5 घंटों में तय किया जाना था। वैसे दोनों शहरों के बीच सीधी वायुयान सेवा भी उपलब्ध हैं। काठमांडू से पोखरा जाने वाली सड़कें सिर्फ पहाड़ों, घाटियों और नदियों से ही होकर गुजरती हैं। रास्ते में कुछ गाँव भी दिखाई पड़ते हैं।
फेवा झील, पोखरा, नेपाल 

   काठमांडू से 104 किलोमीटर पर इसी रास्ते में एक मंदिर है
मनोकामना मंदिर, जहाँ जाने के लिए तीन किमी लंबी केबल कार या रोपवे चलती हैं। किन्तु
एक समय वहां तक जाने के लिए सिर्फ पैदल मार्ग ही था। केबल कार के निचले स्टेशन कुरिन्तर से ऊपरी स्टेशन मनोकामना तक दोनों तरफ का किराया 575 रूपये चुकाने पड़े थे। हिमालय के इन हरे भरे वनों के ऊपर से बीस मिनट का केबल कार का सफ़र बड़ा ही रोमांचक होता है। ऊपर मंदिर परिसर में बड़ी चहल पहल रहती है। इस मंदिर का स्वरुप भी पैगोडा जैसा ही है।
   मनोकामना दर्शन के बाद सफ़र को फिर से आगे बढ़ाते हुए हम शाम के पांच बजे पोखरा पहुँचते हैं। पोखरा एक ऐसा शहर है जो काठमांडू जैसा व्यस्त नहीं है बिलकुल शांत है, लेकिन यहाँ की शाम बड़ी ही निराली है और जैसे ही थोडा और अँधेरा हुआ, गलियारे बड़े बड़े रंग बिरंगे रोशनियों से भर उठे और मुझे तो लगभग गोवा की ही याद आ रही थी। यहाँ हमारा ठिकाना होता है होटल तिब्बत होम में।
   पोखरा दर्शन की शुरुआत अगली सुबह सारंगकोट नामक जगह से हुई। पोखरा से सिर्फ पांच छह किलोमीटर की दुरी पर 5500 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित यह एक बहुत ही रमणीय स्थल है जहाँ से हिमालय के धौलागिरी और अन्नपूर्णा की श्रृंखला देखी जा सकती है। साथ ही पोखरा शहर के अंदर स्थित सुप्रसिद्ध फेवा झील भी यहाँ से नजर आती है। चूँकि यहां पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी थी साथ ही बादलों की वजह से सूर्यास्त नहीं देख पाये। फिर भी आसमानी दृश्य बड़ा ही रूमानी था।
    सारंगकोट से आगे बढ़ते हुए एक मंदिर आया विंध्यवासिनी, यह गुप्तेश्वर महादेव की गुफा वाले रास्ते पर ही था। यहाँ हमने एक नेपाली शादी भी देखी।
   पोखरा के नजदीक बहने वाली सेती नदी का क्या कहना? आश्चर्य इस बात की है की इस नदी का सारा पानी दूधिया रंग का है। मैंने हाथ से जरा पानी उठा कर देखा तो साफ़ था लेकिन नदी का पानी सफ़ेद। शायद पानी में चुना पत्थर घुले होने के कारण ऐसा होगा।
   इसी नदी के मार्ग में ही पांच हजार साल पुरानी गुप्तेश्वर महादेव की गुफा और डेविस फाल्स भी हैं। इस गुफे के अँधेरे में अंदर जाना बड़ा ही रोमांचकारी था। सबसे विचित्र बात यह है की गुफे के अंदर कहीं भी मिट्टी नहीं है, साथ ही अंदर चट्टानों से हमेशा पानी रीसता रहता है लेकिन फिर भी कहीं काई नहीं जमती जो की हैरानी की ही बात है। गुफे के अंदर भी एक झरना है।
      इस गुफे से कुछ ही दुरी पर है डेविस फाल्स। कहा जाता है की सन् 1961 में एक स्विस दंपति के गिर कर मौत हो जाने की वजह से इसे डेविस फाल्स नाम दिया गया था।
इस तरह से पोखरा के आस पास के सारे नज़ारे देख लेने के बाद अंतिम पड़ाव शहर के अंदर ही स्थित फेवा झील था। पोखरा का मुख्य आकर्षण होने के साथ साथ चारों ओर से पहाड़ों से घिरा यह झील बहुत ही मनोरम दृश्य पैदा करता है। यहाँ बोटिंग की भी सुविधा है जिसपर हमने कुछ घंटे झील में बिताए। गौरतलब है की इस ब्लॉग का मुख्य कवर फ़ोटो इसी फेवा झील का ही है।
    फिर रात आई और यहाँ भी काठमांडू की तरह हर गली गली में डिस्को और पार्टी की धूम थी। कुल मिलाकर पोखरा मुझे लगभग गोवा जैसा ही लगा। 
अब एक नजर तस्वीरों पर -



















नेपाल यात्रा का अंतिम पड़ाव आ चूका था और अगली सुबह वापसी की यात्रा इस बार पोखरा से गोरखपुर होकर करनी थी। अब वापसी के सफ़र में गोरखपुर, बनारस और मुगलसराय के बारे पढ़िए अगले पोस्ट में।

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  1. धन्यवाद् भाई

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  2. बढ़िया यात्रा चल रही है प्रजापति जी। साथ साथ चल रहा हूँ। आभार।

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  3. राम जी आप बहुत अच्छा लिखते है पर इस बार
    आप बहुत जल्दी में इस यात्रा स्मरण को लिख दिए ।
    अपने मनोकामना मंदिर की कोई भी जानकारी यहाँ नहीं लिखी है ।सिर्फ उड़न खटोले के बारे में बताया ।
    फेवा झील के बीच में भी एक मंदिर है शायद आप वहा भी नोका से गए होंगे ।
    गुप्तेश्वर महादेव की गुफा का पानी शायद डेविस फाल से ही आता है ।
    आपने सच कहा पोखरा की शाम गोआ की याद दिलाती है ।
    शादी में दावात का निमंत्रण मिला की नहीं ।
    फ़ोटो वाकई बहुत अच्छे है ।

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    1. मनोकामना मंदिर के बारे ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई, इसीलिए ज्यादा कुछ खास नहीं लिख सका. फेवा झील का मंदिर याद है मुझे. गुप्तेश्वर महादेव का पानी भी डेविस फाल्स से ही आता है. शादी तो मंदिर में ही थी, किन्तु दावात कहीं और ही था . धन्यवाद्

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