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दक्षिणी झारखण्ड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में एक छोटा सा शहर है चाईबासा। चारो ओर से हरे-भरे पेड़-पौधों से घिरा हुआ सारंडा जंगल के समीप यह एक आदिवासी बहुल इलाका है जो अपने सबसे नजदीकी बड़े शहर जमशेदपुर से 60 किलोमीटर और राज्य की राजधानी रांची से 145 किलोमीटर की दुरी पर है। विरल जनसंख्या घनत्व के कारण यह शहर काफी शांत और भीड़-भाड़ से दूर है। यह एक प्राचीन शहर है जिसके सम्बन्ध पुरातत्वविदों के अनुसार पाषाण काल से हैं।
लुपुंगहुटु, चाईबासा : पेड़ के जड़ों से निकलती जलधारा      
  1. चांडिल बाँध - जमशेदपुर के आस पास के नज़ारे (Chandil Dam, Jharkhand)
  2. पारसनाथ: झारखण्ड की सबसे ऊँची चोटी  (Parasnath Hills, Jharkhand)
  3. एक सफर नदी की धाराओं संग (River Rafting In The Swarnarekha River, Jamshedpur)
  4. कुछ लम्हें झारखण्ड की पुकारती वादियों में भी (Dalma Hills, Jamshedpur)
  5. झारखण्ड की एक अनोखी घाटी ( Patratu Valley, Ranchi)
  6. चाईबासा का लुपुंगहुटू: पेड़ की जड़ों से निकलती गर्म जलधारा (Lupunghutu, Chaibasa: Where Water Flows From Tree-Root)
  7. हिरनी जलप्रपात और सारंडा के जंगलों में रमणीय झारखण्ड (Hirni Falls, Jharkhand)
  8. दशम जलप्रपात: झारखण्ड का एक सौंदर्य (Dassam Falls, Jharkhand)
  9. क्या था विश्वयुद्ध-II के साथ झारखण्ड का सम्बन्ध? (Jharkhand In World War II)
  10. जमशेदपुर में बाढ़ का एक अनोखा नमूना (Unforeseen Flood in Jamshedpur)
  11. नेतरहाट: छोटानागपुर की रानी (Netarhat: The Queen of Chhotanagpur)
  12. किरीबुरू: झारखण्ड में जहाँ स्वर्ग है बसता (Kiriburu: A Place Where Heaven Exists)

   
जनजातीय क्षेत्र होने के कारण चाईबासा मुख्यतः स्थानीय लोगों द्वारा मनाये जाने वाले त्योहारों जैसे की सोहराई आदि के लिए जाना जाता है।
झारखण्ड के पुराने पर्व-त्यौहार, नृत्य कलाएं आदि की मौजूदगी के कारण ही  यह शहर भी राँची जैसा ही आभाष कराता हुआ जान पड़ता है। यहाँ बोले जाने वाली भाषाओँ में हिंदी, संथाली, हो, मुंडारी आदि प्रमुख हैं। शहर के अंदर रूंगटा गार्डन एवं शहीद पार्क मुख्य दर्शनीय स्थल हैं।
         चाईबासा और इसके आस पास के इलाके खनिज संसाधनों से भरे पड़े है। रुंगटा माइंस लिमिटेड नामक एक कंपनी का मुख्यालय भी यहाँ स्थित है जो की झारखण्ड-उड़ीसा सीमा में लौह-अयस्क और मैंगनीज़ का खनन करती है। नजदीकी खनन इलाके जैसे की नोवामुण्डी, किरीबुरू और जोड़ा भी आस-पास ही स्थित है जिनके गर्भ से दशकों से बहुमूल्य खनिजों का निरंतर निष्कासन हो रहा है। मात्र 15 किलोमीटर की ही दुरी पर झींकपानी नामक जगह में एसीसी (ACC) का सीमेंट कारखाना स्थित है। इस तरह अगर देखा जाय तो समूचा दक्षिणी झारखण्ड का इलाका ही लौह अयस्क सम्बंधित उद्योगों से भरा हुआ है।
            दक्षिणी झारखण्ड का एकमात्र यूनिवर्सिटी कोल्हान यूनिवर्सिटी भी चाईबासा में ही स्थित है, जबकि आश्चर्य इस बात की है की नजदीकी बड़े शहर जमशेदपुर में आज तक कोई यूनिवर्सिटी नहीं है। यहाँ स्कूल अच्छे हैं, और निजी स्कूल भी काफी संख्या में हैं। 
                  झारखण्ड एक पठारी राज्य है और इसके हर हिस्से में कोई न कोई पहाड़ी या नदी का होना स्वाभाविक है। जैसा की इससे पहले के कुछ पोस्टों में मैंने राँची और इसके आस पास के कुछ मनमोहक जलप्रपातों एवं घाटियों का जिक्र किया था, इसी तरह चाईबासा में भी कुछ इसी तरह के दृश्य मौजूद हैं।
                     एक दिन जमशेदपुर से पश्चिम की ओर सराईकेला होते हुए बस यूँ ही अपनी बाइक निकालकर चाईबासा की ओर निकल पड़ा। रास्ता बहुत ही अच्छा होने के कारण 65 किलोमीटर की दुरी मात्र सवा घंटे में ही तय हो जाती है।
                              चाईबासा के मुख्य मार्ग से चार-पांच किलोमीटर की दुरी पर लुपुंगहुटु नामक एक पिकनिक स्थल है। देखने में तो यह एक सामान्य पिकनिक स्पॉट जैसा ही है लेकिन इसकी भी अपनी एक विशेषता है। 10-12 पेड़ों से घिरा हुआ यह एक छोटा सा स्थान है जहाँ निरंतर पतली-पतली गर्म जलधाराएं बहती रहती हैं। लेकिन जब मैंने इनके स्रोत पर ध्यान दिया तो बात कुछ हजम नहीं हुई। दरअसल ये जलधाराएं पेड़ों के जड़ों से ही निकल रही थी। चट्टानों के किनारे बहने वाली धारा पर पत्ते लगाकर लोग बोतलों में जल इकठ्ठा भी कर रहे थे। ऐसी मान्यता भी है की इस जल से कुछ स्वास्थ्य लाभ भी होता है। चाईबासा की एकमात्र नदी रोरो भी नजदीक ही बहती है। आस -पास आबादी ज्यादा नहीं है, सिर्फ एकांत प्रकृति ही है। चाईबासा रेल मार्ग से भी भली भांति जुड़ा हुआ है। 
                     यूँ तो यह एक छोटा सा ही शहर का पिकनिक स्थल है, लेकिन, दिसंबर-जनवरी के महीने में यहाँ की रौनक कुछ देखने लायक होती है, जहाँ आस-पास के लोग पिकनिक या वनभोज मनाने जरूर आते हैं। 


  छोटी सी यह यात्रा मात्र कुछ ही घंटों में समाप्त हो जाती है, लेकिन यादें छोड़ जाती है।



चाईबासा से लुपुंगहुटू जाने का मार्ग 














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  1. पेडो की जड से गर्म पानी निकलता है, यह बात समझ में नही आई, जरूर जमीन के नीचे कोई पानी का स्रोत होगा जो जडों के सहारे बाहर आता होगा।

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  2. सचिनजी, पानी का मूल स्रोत तो भूमिगत ही होगा क्योंकि पेड़ खुद तो पानी पैदा करते नहीं। लेकिन कुछ पेड़ ऐसे होते हैं जो अपने द्वारा अवशोषित जल का कुछ अतिरिक्त हिस्सा यूँ ही जड़ या तने के माध्यम से विसर्जित कर देते है, ऐसी जानकारी कुछ स्रोतों से मिली है। लेकिन हाँ,इस पोस्ट के मामले में चाईबासा वाले पेड़ के बारे ज्यादा अध्ययन अब तक नही हो पाया है,लेकिन जल पेड़ के जड़ों से ही निकलती प्रतीत होती है। पेड़ों की कुछ विशिष्ट प्रजातियां ही इस तरह का व्यवहार करती हैं।

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  3. पेड़ो के बारे में आपने कुछ नही बताया है । किस प्रजाति के पेड़ है । वैसे रोचक जानकारी है ।

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    1. मुकेशजी, पेड़ों के बारे जानकारी नहीं मिल पाई, लेकिन जल्द ही बताने की कोशिश में हूँ. धन्यवाद.

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    2. मुकेशजी अभी अभी यह पता चला है की इन पेड़ों को "अर्जुन" का पेड़ कहा जाता है .

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  4. बढ़िया..... चाईबासा ...

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    1. शुक्रिया आपका।

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