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दोस्तों हम सब जानते हैं की "घूमना" दुनिया के उन "जुनूनी शौकों" में शामिल है जिसकी थोड़ी बहुत मात्रा हर शख्स के अन्दर मौजूद है। हर व्यक्ति के लिए इस विषय पर अपने-अपने विचार हैं। ज्यादातर लोगों से पूछने पर वे यही कहेंगे की वे रोजमर्रा की उबाऊ ज़िन्दगी से कुछ समय के लिए छुटकारा पाने के लिए घूमना पसंद करते हैं, और वे साल में कम से कम एक बार लम्बी छुट्टी पर अवश्य कहीं न कहीं जाते ही हैं, चाहे देश हो या विदेश। कुछ लोग धार्मिक कारणों से भी भ्रमण पर निकलते हैं, लेकिन उनकी सीमा प्रायः धार्मिक स्थलों तक ही सीमित होती है। ये लोग सामान्य किस्म के पर्यटक या Tourist होते हैं।
                                लेकिन कुछ लोग ऐसे भी
हैं जो सामान्य से कुछ अधिक ही जिज्ञासु किस्म के होते है, जुनूनी होते हैं, उनमें दुनिया देखने की इतनी लालसा होती है, की घूमने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। उनके लिए महंगे-महंगे होटल या रेस्टोरेंट मायने नहीं रखते, रात तो वे कहीं भी बिता सकते है, बस नयी-नयी चीजें देखने की तमन्ना पूरी होनी चाहिए। इस तरह के घुमक्कड़ प्रायः देश-दुनिया के इतिहास-भूगोल और रहन-सहन में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। ऐसे लोग अक्सर लम्बे-लम्बे देश भ्रमण पर निकल पड़ते हैं, बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के भी, यहाँ तक की अपनी मोटरसाइकिल से भी, पीठ पर सामान ढोकर। इस श्रेणी के जो लोग हैं, उन्हें सामान्य श्रेणी के पर्यटक न कहकर अक्सर "घुमक्कड़" या Traveller या Backpacker शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
                               मेरे फेसबुक और व्हाट्सएप्प ग्रुप में भी देशभर के दोस्त है, उनमें से लगभग सभी का जोर घुमक्कड़ी पर ही है। लेकिन क्या किसी को भी घुमक्कड़ का दर्जा मिल पाना संभव है? अगर परिभाषा के तौर पर देखा जाय तो अधिकांश लोग पर्यटक या घुमक्कड़ किसी भी श्रेणी को पूर्णतः संतुष्ट नही करते, इसीलिए मिश्रित श्रेणी में आ सकते है, यानी पर्यटक और घुमक्कड़ दोनों।
                               मैं पिछले पांच-छः सालों से यात्रायें कर रहा हूँ, शुरूआती दौर में एक आम पर्यटक की भाँती ही घूमता था, लेकिन इस क्षेत्र के कुछ धुरंधरों के बारे जानकर लगा की सिर्फ सामान्य तरीके से घूमने से काम नहीं चलने वाला। अगर दुनिया को देखने की हसरत पूरी करनी हो तो कुछ नए नए प्रयोग भी करने पड़ेंगे। मैंने कुछ सोलो ट्रेवेलेर या Solo Traveler के बारे पढ़ा जो अकेले ही घुमने निकल जाते है। अकेले घुमने के मामले में पुरुषों की तुलना में कुछ महिलाओं के बारे जानकर अधिक ख़ुशी व प्रेरणा मिली। इनमें मैंने देहरादून की शिव्या नाथ एवं मुंबई की रेणुका के बारे हाल में एक महिला के माध्यम से ही जाना। ये दोनों पूरी दुनिया अकेले घूम रही है।
                     इस तरह अगर देखा जाय तो एक सामान्य पर्यटक के लिए घूमना सिर्फ एक शौक है, लेकिन घुमक्कड़ के लिए घूमना ज़िन्दगी का मसकद भी हो सकता है। घुमक्कड़ी को ज़िन्दगी के मकसद के तौर पर लेने वाले लोगों में सबसे ज्वलंत प्रमाण वे लोग है जो घूमने के लिए नौकरी तक छोड़ देते है, और ऐसी नौकरी या काम करते हैं जिसमे घूमना शामिल हो, या फिर घुमने पर भी काम या नौकरी पर कोई असर न पड़े। एक घुमक्कड़ घुमने के लिए अधिक संघर्ष करता है, इसीलिए उसके अनुभव भी कहीं ज्यादा होते है। यात्रा के दौरान हर अनुभव सिर्फ आनंददायक ही नहीं होता, बल्कि कुछ अनुभव काफी कडवे भी होते हैं और ज़िन्दगी भर जेहन से नहीं उतर पाते। 
                अब तक की जो यात्रायें मैंने की हैं, उनमें ढेर सारे खट्टे-मीठे अनुभव जुड़े हुए हैं, उन्हें अब साझा कर रहा हूँ। खैर इन अनुभवों के आधार पर मैं यह दावा बिलकुल नहीं कर रहा की मैं कोई बहुत बड़ा घुमक्कड़ बन गया, सारे अनुभव एक आम यात्री की तरह ही हैं। इन अनुभवों से किसी व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक दोनों स्तिथियों का परिक्षण हो जाता है।
                                सन 2011 की बात है। मेरे ब्लॉग पर एक पोस्ट ट्रेन की हेराफेरी के बारे है, जिसमें गोवा जाते समय गलत ट्रेन पर चढ़ने के कारण काफी परेशानी उठानी पड़ी थी। टाटानगर से मुंबई की ओर जाने वाली ट्रेन के बजाय हम कोलकाता की ओर जाने वाली ट्रेन में बैठ गए, खड़गपुर स्टेशन पर उतर गए, घोर चिंतन किया, टीटीई को फाइन भी भरा, अंत में फिर दूसरी ट्रेन से कोलकाता ही गए लेकिन वापस घर नहीं गए। इस घटना ने कोलकाता से मुंबई की पहली हवाई यात्रा करने का मौका दे दिया। एक ओर तो इस यात्रा ने पहली हवाई यात्रा का मौका दिया, दूसरी ओर यह भी सिख मिली की कभी भी ट्रेन चढ़ने से पहले कम से कम यह जांच ले की ट्रेन गलत तो नहीं है! यही नहीं बल्कि, गोवा के वागतोर तट पर अनजाने में कुछ जुआ खेलने वालो के पास जाना महंगा साबित हुआ, चार हजार रूपये की चपत लगी थी। इसके बारे गोवा के कडवे अनुभव में पहले ही मैं लिख चुका हूँ।
                     2012 में ताजमहल देखने की योजना बनी थी, लेकिन वो भी भीषण गर्मी वाले मई के महीने में। आगरा पहुँच कर ऐसा लगा की ताजमहल देखने नहीं, बल्कि आग सेंकने आये है! ताज के चबूतरे पर नंगे पैर चलना एक चुनौती था, संगमरमर पर भी! तब यह सीखा की कहीं जाने के लिए कुछ हद तक सही मौसम का भी चुनाव कर ही लेना चाहिए।
              2013 में दार्जिलिंग-सिक्किम यात्रा के दौरान एक मामूली सी परेशानी हुई थी नाथुला जाते समय। पर्वतों पर भूस्खलन या landslide होना एक आम बात है। हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। गंगटोक से नाथुला वाले मार्ग पर बड़े-बड़े चट्टानों के गिरने के कारण काफी वक़्त बर्बाद हुआ, लगा की अब नाथुला से हाथ धोना पड़ेगा, तीन घंटे बाद रास्ता साफ़ हुआ, और यात्रा संपन्न हुई। नाथुला पहुँचते ही दिन के एक बजे शून्य से नीचे तापमान वाली हवा ने हड्डी कंपकपा दी। इतनी ठण्ड का अंदाजा भी नहीं था, और ज्यादा मोटे कपडे भी पहन कर नहीं गए थे।
             अब तक तो सारी यात्रायें सिर्फ ट्रेनों और बसों से ही की थी। एक बार कुछ दोस्तों के साथ दीघा जाने का कार्यक्रम बन रहा था, और सभी बाइक से जाने को कह रहे थे। जमशेदपुर से दीघा लगभग तीन सौ किमी है, और मैंने इतनी दूर कभी बाइक नही चलायी थी। ईमानदारी से कह दूं तो मुझे बड़ी हिचक हो रही थी।
लेकिन दोस्तों ने मुझे राजी किया और अंत में यह मेरी पहली सबसे लम्बी बाइक यात्रा बन गयी। यह 2014 की बात थी।
           2014 में ही नेपाल से वापसी के दौरान मुगलसराय से टाटा को जाने वाली ट्रेन छुट गयी, जिसमें हमारा आरक्षण पक्का था। लेकिन पांच लोगों के अपने ग्रुप से बिछड़ कर बनारस दर्शन के चक्कर में मेरी ट्रेन छुट गयी। इस कारण मुगलसराय स्टेशन पर बारह घंटे तक घोर इंतज़ार के बाद एक अन्य ट्रेन मिली, जिसने पश्चिम बंगाल के आद्रा तक हमारा साथ दिया। रात भर आठ घंटे तक की यह यात्रा, जनरल टिकट पर, वो भी भीषण गर्मी में, जहाँ  पाँव रखने की भी जगह नहीं थी, एक कष्टदायक, किन्तु यादगार यात्रा बन गयी।
                      2015 में बैंगलोर दर्शन करवाने वालों ने थोड़ी सी परेशानी दी। किसी बड़े शहर में सिटी टूर करवाने वालो के कई एजेंट होते हैं। ये नए लोगों से मनमाना रकम वसूलते हैं। जिस एजेंट से हमारा पाला पड़ा, उसने बस में सीट देने का वादा तो किया, और बस के पास भेज दिया। बस वाले ने कहा की सीट खाली नहीं है। अब उनसे तर्क करके कोई फायदा न था। कहा की जिनको पैसे दिए हैं, उन्ही से निपटा लो! ये क्या बात हुई? पैसे लेने वाले कोई और, घुमाने वाले कोई और! एक ही सीट पर दो लोगों को यात्रा करनी पड़ी। साथ ही यह भी पता चला की हर यात्री ने अलग-अलग पैसे दिए है, किसी ने ढाई सौ, किसी ने दो सौ, मैंने एक सौ अस्सी।
                कुछ दिनों पहले झारखण्ड के एक पर्वतीय क्षेत्र किरीबुरू यात्रा के दौरान रात बिताने की समस्या आई। किरीबुरू में होटल नही है, यह बात भली-भांति हमें मालूम न थी, लेकिन अंत में एक स्थानीय व्यक्ति के घर में ही रुकना पड़ा। इस यात्रा ने पहली बार होमस्टे या Homestay का अनुभव दिया।
              इस तरह हर यात्रा कुछ न कुछ नया अनुभव दे जाती है, और व्यक्ति को और अधिक परिपक्व बनाती है। अभी तो घुमक्कड़ी के और भी नए नए मुकाम हासिल करने है, ये तो सफ़र की शुरुआत भर ही है।

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  1. ये यात्रा यूँ ही जारी रखियेगा आरडी भाई ! अन्त शुभकामनाएं

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद योगीजी !

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  2. अनंत शुभकामनाएं

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