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मेघालय! जिसका नाम सुनते ही बादलों का ख्याल आता है और चेरापूंजी का नाम सुनते ही बरसात का ख्याल आता है! एक समय यह दुनिया का सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान था लेकिन पड़ोस के मसीनराम ने इसे दूसरे पायदान पर खिसका दिया है, फिर भी अभी तक चेरापूंजी ही अधिक प्रसिद्द है। हम अधिकतर स्थानों में वर्षा की माप मिलीमीटर में देखते हैं, लेकिन यहाँ की वर्षा मीटर में होती है! साल भर की बारिश करीब बारह हजार मिलीमीटर यानि बारह मीटर! है न आश्चर्यजनक! बचपन से हम पढ़ते आये थे की चेरापूंजी दुनिया का सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है, पिछले कुछ वर्षों से पचास-साठ किमी दूर स्थित मसिनराम पहले नंबर पर आ गया है। शिलांग शहर का एक भ्रमण करने के बाद एक दिन हमने चेरापूंजी के भी नाम किया..
       
 मेघालय के पिछले पोस्ट:

           चेरापूंजी भ्रमण के लिए हमने शिलांग के पुलिस बाजार स्थित मेघालय के सरकारी टूरिज्म ऑफिस से एक दिन का टूर बुक किया जिसके टिकट की कीमत थी- साढ़े तीन सौ रूपये प्रति व्यक्ति। वैसे कुछ प्राइवेट टूर वाले भी चेरापूंजी का भ्रमण करवाते हैं। शिलांग से चेरापूंजी की दूरी कोई पचास-पचपन किमी की है, लेकिन ऐसा नहीं है की शिलांग से चलना शुरू किया और चेरापूंजी पहुँच कर ही दम लेना है, बल्कि दोनों शहरों के बीच रास्तों का जो सौंदर्य है उसे देखते देखते आप कभी समय पर चेरापूंजी पहुँच ही नहीं पाएंगे! शिलांग के शहरी क्षेत्र से बाहर निकलते ही साफ़-सुथरे घुमावदार पहाड़ी रास्ते शुरू हो जाते है और हर पेड़ एक नुकीले क्रिसमस ट्री जैसा दिखता है! पूरा मेघालय ही एक बगीचे जैसा जान पड़ता है!
                  शिलांग से लगभग तीस किमी आगे बढ़ने पर एक बहुत गहरी घाटी मिलती है जिस पर एक पुल बना हुआ है। इस पुल का नाम है - दुवान सींग सिम ब्रिज (Duwan Sing Syiem Bridge). वैसे इस पुल नीचे कोई बड़ी नदी नहीं है, सिर्फ छोटे-छोटे नाले ही हैं। शिलांग से चेरापूंजी जाते समय यह स्थान एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है जहाँ पर्यटक अवश्य रुकते हैं। दोनों तरफ से हरे-भरे पहाड़ और बीच में एकदम गहरी खाई वाली इस घाटी का नाम है - मौकड़ोक घाटी (Mawkdok Valley). तो इस मौकड़ोक घाटी पर साल के अधिकांश महीनों में तो बादल ही छाये होते हैं, पर दिसंबर में ठण्ड का मौसम होने के कारण आसमान बिल्कुल साफ़ था। बिना बादलों वाले मेघालय देखना बड़ा ही दुर्लभ भी है। चारों तरफ के नयनाभिराम दृश्यों को देखकर तो यहाँ से जाने का दिल ही नहीं करता! घाटी में आप कुछ दूर तक नीचे उतर कर एक व्यू पॉइंट पर जा सकते हैं। यहाँ से प्रकृति के द्वारा अपने हाथों से बनाये बगीचों का असीम आनंद लिया जा सकता है।
                     मौकड़ोक घाटी से चेरापूंजी की दूरी अब सिर्फ बीस-पच्चीस किमी ही बची थी। लेकिन पूरे रास्ते भर ऐसे ही रंगीन नज़ारे मिलते रहे। चेरापूंजी के बारे अगर आपने पहले जरा सा भी खोज-बीन किया हो, तो आपके मन में सेवन सिस्टर वॉटरफॉल्स (Seven Sisters Waterfalls) का जरूर ख्याल आ रहा होगा! चेरापूंजी पहुँचते-पहुँचते हमें सेवन सिस्टर के दर्शन तो होने ही लगे,लेकिन इससे पहले हम इस प्रपात के ऊपरी सिरे पर स्थित एक पार्क की ओर बढे जिसे इको पार्क का नाम दिया गया है।
                           यह इको पार्क मेघालय सरकार द्वारा बनवाया गया है और यहाँ से चेरापूंजी के स्वर्ग जैसे घाटियों के दर्शन होते हैं। अगर बरसात के मौसम में आते तो नज़ारे और भी बेहतर हो सकते थे, फिर भी एक बार साफ़ मौसम में इन्हें देखने में भी आनंद आ रहा था। हम अभी सेवन सिस्टर फाल्स से ऊपर यानि उसके उद्गम स्थल के ऊपर ही खड़े थे। यहाँ से इस प्रपात का सिर्फ एक भाग ही दिखाई पड़ता है। ठण्ड के सूखे मौसम में सिर्फ दो-चार पतली जलधाराएं ही नजर आ रही थीं।
                              चूँकि चेरापूंजी मेघालय के दक्षिणी छोर स्थित बांग्लादेश की सीमा से सटा हुआ है इसलिए यहाँ से घाटियों के आगे का जो समतल धुंधला भूभाग नजर आता है, वो कोई और नहीं बल्कि बांग्लादेश ही है! अपने देश से एक पडोसी देश को देखने के लिए लोगों ने अपने-अपने कैमरों के ज़ूम बढाकर तस्वीरों को खूब कैद करना शुरू कर दिया। परन्तु धुंधलेपन के कारण बांग्लादेश की कोई वस्तु वैसे समझ नहीं आ रही थी। चेरापूंजी में और भी कुछ स्थान हैं जहाँ से बांग्लादेश और भी साफ़ दिखाई देता है, जहाँ आपको आगे ले चलूँगा।
                 इको पार्क से बाहर निकलते समय मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी जिसपर मिसिंग फाल्स (Missing Falls) लिखा हुआ था। नीचे एक कुआँ जैसा कुछ बना था जिसके ऊपर एक जाली लगी थी। अंदर झाँकने पर पाया की झर-झर करती हुई एक जलधारा नीचे की ओर टपक रही है। जमीन के अंदर ऐसा छुपा हुआ जलप्रपात पहली बार देख रहा था, और इसके छुपे होने के कारण ही इसे मिसिंग यानि गुप्त फाल्स कहा गया होगा।
           आगे बढ़ते हुए अब हम आते हैं चेरापूंजी के एक और अति महत्वपूर्ण जलप्रपात जिसे नोहकालीकाई प्रपात (Noh Ka Likai Falls) कहा जाता है। इस प्रपात के पीछे एक कहानी है। एक कलिकाई नामक महिला थी, जिसने दूसरी शादी की। उसकी पहले से ही एक बेटी थी जिससे उसका दूसरा पति नफरत करता था। एक दिन वो खेत से काम कर वापस घर आयी तो देखा की उसके पति ने उसके लिए खाना भी बना दिया है और परोस भी दिया है। बिना किसी शक के उसने खाना खा लिया। कुछ देर बाद उसने सुपारी के एक टोकरी में अपनी बेटी की कटी उँगलियाँ देखी। अब वो माजरा समझ गयी की उसके दूसरे पति ने सौतेली बेटी की हत्या कर दी है। इस सदमे के कारण उसने पास के चट्टानों के बीच से निकलते जलप्रपातों में कूदकर अपनी जान दे दी। इस तरह इस प्रपात का नाम भी उसी के नाम पर पड़ा।

                          नोहकलिकाई जल प्रपात के करीब तक जाने का कोई रास्ता नहीं है, सिर्फ दूर से ही नजारा देखा जा सकता है। एक छोटा सा रेस्त्रां बना है, जहाँ हमने दोपहर का खाना खाया, जिसके अंदर बालकोनी से इस प्रपात का नजारा बड़ा ही मनोरम लगता है। ये नज़ारा बाहर से भी देखा जा सकता है। वैसे यहाँ कोई चहारदीवारी तो नहीं है, फिर भी कुछ लोग बस के रुकते ही अंदर घुसकर पर्यटकों से दस रूपये के हिसाब से शुल्क वसूलते हैं और नहीं देने पर पांच हजार रूपये जुर्माना लेने की धमकियाँ भी देते है। पता नहीं ये लोग सच में मेघालय पर्यटन से जुड़े हैं या स्थानीय लोगों की बदमाशी है।
            अंत में एक बार फिर से वापसी के समय सेवन सिस्टर फाल्स की ओर बढ़ने लगे। बरसात का समय न होने के कारण इस जलप्रपात का पूरा आनंद तो न आया, फिर भी दो-चार जलधाराएं दिख रही थी। बारिश मौसम में एक बार फिर कभी चेरापूंजी आना ही होगा, ऐसा लगता है।
       चेरापूंजी में रात बिताने लिए कोई खास व्यवस्था भी नहीं है और रुकने की वैसे भी कोई खास जरुरत नहीं है। इसलिए चेरापूंजी में एक ही दिन का भ्रमण काफी है।
अब कुछ तस्वीरें-----
मौकड़ोक घाटी 
















 इको पार्क 





 बांग्लादेशी भूभाग 




 मिसिंग फाल्स 



इको पार्क से सूखा हुआ सेवन सिस्टर फाल्स 
अगर बरसात में आते तो कुछ ऐसा नजारा होता... 




 बांग्लादेश 



 नोहकलिकाई प्रपात 






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मेघालय के पिछले पोस्ट:

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  1. बढ़िया जानकारी, सचित्र विवरण , सुन्दर नज़ारे, अगर चेरापूंजी की थोड़ी बारिश दिल्ली आ जाये तो इस गर्मी से थोड़ी राहत मिले। वैसे आपकी ये पोस्ट पढ़कर और चित्रों को देखकर मेरा मन भी जाने का करने लगा है पर कहाँ कहाँ जाएँ

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    1. जहाँ मन करे उधर ही निकल पड़िए..

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-05-2017) को
    "मानहानि कि अपमान में इजाफा" (चर्चा अंक-2636)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. आभार शास्त्री जी!

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  3. बिना बारिश के सोहरा कुछ अलग ही दीखता है...बढ़िया जानकारी बढ़िया पोस्ट

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  4. सेवन सिस्टर फाल तो एक दम ही सुखा लगा रहा। जमीन आसमान का अंतर है बारिश और अन्य दिनों में।

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    1. जी बारिश और बिना बारिश दोनों में बहुत अंतर है, इसलिए अगर बारिश से कोई परेशानी अगर न हो तो बारिश में ही जाना चाहिए...

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  5. Wow ...

    दिल हूम हूम करे!

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  6. शानदार और खूबसूरत जगह है चेरापूंजी और वहां तक पहुँचने का रास्ता ! बांग्ला देश तो शिलॉन्ग पीक से भी दीखता है ?

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    1. बिलकुल योगीजी

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  7. Hey keep posting such good and meaningful articles.

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  8. I would like to say that this post is awesome, nice written and include almost all important information. I’d like to see more posts like this.

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  9. सेवन सिस्टर तो अपने रूप ने नहीं मिला आपको। कोई नहीं प्रकर्ति के अनेको रूप होते है जो आपको देखने को मिला वो रूप भी मनोरम है।

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