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                  पोर्ट ब्लेयर से तीस किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम की ओर वंडूर नामक एक तट है। यह इलाका महात्मा गांधी मरीन नेशनल पार्क के अंतर्गत एक सुरक्षित क्षेत्र है। आपने जॉली बॉय या रेड स्किन नामक द्वीप का नाम भी सुना ही होगा जो पोर्ट ब्लेयर के आस पास के द्वीपों में काफी प्रसिद्ध है। यह एक ऐसा नेशनल पार्क है जिसके अंदर जंगलों वाले द्वीप भरे पड़े हैं। कुल मिलाकर बारह द्वीप हैं यहाँ जिनमे से सिर्फ दो पर ही पर्यटकों को जाने की अनुमति है- जॉली बॉय एवं रेड स्किन।
दोनों द्वीपों को बारी बारी से छह-छह महीने के लिए खोला जाता है। अक्टूबर से मार्च तक जॉली बॉय खुला रहता है, तो अप्रैल से सितंबर तक रेड स्किन। पर्यटकों के आवाजाही के कारण इन द्वीपों के प्राकृतिक स्वरूप को कुछ न कुछ क्षति तो होती ही है, इसे संतुलित करने के लिए बाकी के छह महीने इन्हें बंद कर लिया जाता है। 

जॉली बॉय द्वीप                   


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पोर्ट ब्लेयर से वंडूर जाने के लिए बसें तो सुबह पांच बजे से ही शुरू हो जाती हैं, आप चाहे तो बाइक भी किराये पर ले सकते हैं। वंडूर शहरी क्षेत्र से बिल्कुल बाहरी इलाका है, और हरे-भरे गांवों के बीच से रास्ते गुजरते हैं। वंडूर में वन विभाग के दफ्तर से ही जॉली बॉय की परमिट लेनी थी, इसलिए सुबह की पहली बस से ही उधर निकल पड़ा। जॉली बॉय का परमिट वैसे पोर्ट ब्लेयर में ही टूरिज्म ऑफिस से मिल जाता है, दो दिन पहले, लेकिन मैं तो पोर्ट ब्लेयर से बाहर डिगलीपुर वगैरह घूम रहा था, इसलिए वक़्त नहीं मिला। सीधे वंडूर ऑफिस में परमिट मिलने की कोई गारंटी नहीं होती, सीमित संख्या में टिकट जारी किये जाते हैं अगर कोटा पहले ही पूरा हो गया हो, तो टिकट मिलने से रहा। 


                    सुबह छह बजे वंडूर पहुंचा। सड़क पर महात्मा गाँधी नेशनल मरीन नेशनल पार्क का स्वागत बोर्ड लगा है, मैंने बस वाले को कहा की मुझे जॉली बॉय जाना है, उसने एक ऑफिस के पास बस रोकी। मैंने फिर पूछा की क्या जॉली बॉय यहीं से जाते है? वो झुंझला गया और कहा भाई उतर जाओ पहले, सब पता चल जायगा वहां! अंडमान में इस प्रकार की ये पहली झुंझलाहट थी, वरना यहाँ के लोग पूछने पर बड़े अच्छे से जवाब दिया करते हैं। इतनी सुबह न तो ऑफिस खुली थी, न कोई पर्यटक ही दिख रहा था। एक किलोमीटर आगे वंडूर तट था, पर कोई खास बात नहीं लगी उसमें। यह ऑफिस भी समुद्र के कटे-फटे तट के किनारे स्थित है, जंगल सुन्दर हैं बहुत पर पानी मटमैला सा लग रहा था। गावं जैसा इलाका है बिलकुल, इक्के-दुक्के दुकान और ढाबे हैं, पर अभी खुले भी नहीं थे। 
                      एक-डेढ़ घण्टे यूँ ही भटकता ही रहा। सात बजे के आस-पास धीरे-धीरे टूर पैकेज वाले पर्यटक आने शुरू हुए, पर दफ्तर बंद ही था। किसी से पूछने पर कोई कहता साढ़े सात बजे खुलेगा, कोई कहता आठ बजे। ऑफिस तो साढ़े सात बजे खुल गयी, मैंने सोचा की इससे पहले की यहाँ भी लाइन लग जाये, परमिट ले लेता हूँ सबसे पहले। लेकिन काउंटर वाले ने निराश कर दिया। पता चला की सबसे पहले उन्हीं लोगों को जाने दिया जायगा जो पोर्ट ब्लेयर वाले ऑफिस से पहले ही परमिट ले चुके हैं। फिर यदि तीन सौ लोगों का कोटा पूरा नहीं हुआ, तो यहाँ से परमिट जारी किया जायगा। अब ऐसा लगा की शायद जॉली बॉय जाना नहीं हो पाएगा। फिर भी उम्मीद लगाए रखा। 
              थोड़ी देर बाद काउंटर पर दुबारा पूछा, "कोई चांस है क्या अब भी परमिट का "? उसने कहा की नौ बजे के बाद ही कुछ बता पाउँगा। पर्यटक आते गए, आते गए, लाइन तो खत्म होने का नाम ही न ले रही थी। परन्तु साढ़े आठ बजे तक अधिकतर अंदर जा चुके थे, कुछ लोग बचे थे। एक नाव में पचास लोग जा सकते हैं, रोजाना छह नाव जाते हैं, यह आखिरी नाव थी। इस आखिरी नाव में बच-खुचे लोगों को बुलाया गया, मुझे भी। इंतज़ार की घडी समाप्त हुई और मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन अंडमान के आखिरी दो दिन  शायद कुछ ठीक नहीं चल रहे थे, लाइन में लगा एक नेवी का एक जवान भी घूमने आया था। जॉली बॉय पर जाने से पहले सारे प्लास्टिक बोतल और पॉलिथीन जमा करके जाने होते हैं, बदले में फ्लास्क दिया जाता है पानी रखने के लिए, दो सौ रूपये की सिक्योरिटी डिपाजिट भी देनी पड़ती है। पर ये सब उस जवान को पसंद न आया, वो कहने लगा "मैं तो प्लास्टिक बोतल ही लेकर जाऊंगा, मेरे पास पैसे भी नहीं हैं और हमारे ऊपर ये सब लागू नहीं होता! सुरक्षा कर्मियों के साथ काफी बकझक हुई। वन विभाग के अधिकारियों ने कहा "जब आठ सौ रूपये भला नाव के टिकट के लिए है, तो दो सौ रूपये के लिए क्यों ऐसा कर रहे हो? वे तो वापस भी हो जाएंगे! " अंततः उसे झुकना ही पड़ा और उसने बोतल जमा किया। लेकिन जॉली बॉय से वापस आने के बाद भी उसने हंगामा करना जारी रखा था।
                                   जॉली बॉय द्वीप एक अति संरक्षित क्षेत्र  है, इस कारण किसी भी तरह के प्लास्टिक बोतल और खाने का सामान ले जाना सख्त मना है। सिर्फ फ्लास्क आप ले जा सकते हैं, दो सौ रूपये की सिक्यूरिटी डिपाजिट देकर। हल्का-फुल्का खाने के लिए वहां कुछ दुकाने रहेंगी। पर्यटक जहाँ भी जाते हैं, कुछ न कुछ कचड़ा तो मचाते ही हैं, इसीलिए ऐसे सख्त कदम उठाये गये हैं।
            तो हमारे नाव का नाम था एम् एल रश्मित। जिस नाव से जाना हैं, उसी नाव से आना भी है। अपने-अपने नावों को पहचानने के लिए ही नाव का नाम याद रखने को कहा जाता है, अगर किसी छूटे हुए यात्री को बुलाना पड़े तो इसी नाव के नाम से ही उसे पुकारा जायगा। वंडूर तट से जॉली बॉय का सफ़र करीब पैतालीस मिनट का रहा, शांत पानी, लहर नहीं के बराबर, दोनों तरफ से मैन्ग्रोव के घने जंगल बड़े अद्भुत थे। ऐसा ही नजारा बाराटांग की गुफाएं देखने जाते समय भी था। बहुत सारे द्वीप इधर उधर दिख रहे थे, सब के कुछ न कुछ नाम जरुर हैं। समुद में स्थित ऐसा राष्ट्रीय उद्यान बड़ा ही रोमाचित कर रहा था। 
                        जॉली बॉय द्वीप पर भी कोई स्थायी जेट्टी नहीं है, बल्कि बाराटांग की तरह ही प्लास्टिक की बनी तैरती जेट्टी है, हिलने-डुलने वाली। छोटा सा ही द्वीप है, पर सुन्दरता बेमिसाल है। पानी का रंग एक दम कांच जैसा साफ़। कोरल तो नंगी आँखों से नहीं दीखते, उसके लिए गिलास बोटम राइड या स्नोर्केलिंग करना पड़ेगा। दस मिनट का ग्लास बॉटम राइड तो फ्री में दिया गया। जॉली बॉय में अंडमान के सबसे उच्च श्रेणी के कोरल पाए जाते हैं और बाहरी दुनिया में भी इनका बड़ा नाम है। सारे कोरल रीफ देखने के लिए लगभग पैतालीस मिनट का ग्लास बोटम राइड के लिए यहाँ छह सौ रूपये लिए जाते हैं, जबकि नार्थ बे तट पर मैंने सिर्फ बीस मिनट के ही पांच सौ दिए थे। इस कारण मैंने पहले भी कहा है की नार्थ बे एक लूट-बाजार है।


                            इस छोटे से द्वीप पर लगभग तीन घंटे बिताने को दिए जाते है, चाहे तो तट में डुबकी लगायें, या छाँव में बैठ कर नीले पानी को निहारें या जंगल में टहले! समय का कुछ पता नहीं चलता। दोपहर बारह बजे ही सभी को बारी-बारी से बुलाया गया, और एक-एक कर सभी नावों ने वापसी करना शुरू कर दिया। 
          वापस जाते समय जॉली बॉय के स्वागत वाले बोर्ड पर मेरी नजर पड़ी जिसपर अब तक मैंने ध्यान नहीं दिया था -- 
LEAVE NOTHING BUT FOOTPRINTS !
TAKE NOTHING BUT MEMORIES !
यानि पद चिन्हों के सिवाय कुछ न छोडकर न जाएँ, यादों के सिवाय कुछ लेकर न जाय !



















































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  3. वंडूर तट और दुनिया के सबसे अच्छे कोरल रीफ वाला जॉली बॉय द्वीप (Wondoor Beach and Jolly Bouy Island: One of the best Coral Reefs of the World)



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    1. आर डी भाई ये पढ़कर तो ऐसा लगा जैसे हम किसी सपने की दुनिया में आ गए है

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      1. बहुत बहुत शुक्रिया भाई जी

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    2. जॉली बॉय के बारे में पढ़कर मजा आ गया । कई नई जानकारियां मिली ।

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      1. बहुत बहुत धन्यवाद् मुकेश जी

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    3. जॉली बॉय के बारे में पढ़कर मजा आ गया । कई नई जानकारियां मिली ।

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    4. घुमक्कडी की मनमोहक चीजो की शब्दो और चित्रो का ऐसा प्रस्तुति एक स्वप्न की तरह अलौकीक लगता है ।

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      1. धन्यवाद कपिल जी

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    5. यहाँ रुकने की भी कोई व्यवस्था है या बापसि आना पड़ता है ।

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      1. किशन जी, इस द्वीप पर न तो कोई रहता है न रहने की कोई गुंजाईश ही है, एक ही दिन, वो भी सुबह जाकर दोपहर तक दर्शन करके लौट आना है.

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    6. यहाँ रुकने की भी कोई व्यवस्था है या बापसि आना पड़ता है ।

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    7. राम भाई वो पानी की बोतल वाली जानकारी बेहद नयी है कही नहीं पढ़ी.. अंडमान की जानकारी एक से एक आपके ब्लॉग से पता चली है

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      1. धन्यवाद प्रतिक जी !

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