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पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में अयोध्या पहाड़ एक सुन्दर लघु पर्वतमाला है जो स्थानीय लोगों के लिए एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट भी है। यह पुरुलिया शहर से करीब चालीस किमी तथा बलरामपुर से भी इतनी ही दूरी पर स्थित है। अगर आप जमशेदपुर से जा रहे हों तो बलरामपुर होकर जा सकते हैं, बस बाघमुंडी नामक स्थान से पांच किमी पहले ही दाहिने मुड़ जाना है। 

         इस लघु पर्वत की विशेषता यह है की यहाँ एक दिन का समय बिताने के लिए सारा कुछ मौजूद है- डैम, पहाड़, झरने, घाटियाँ सबकुछ, जो एक प्रकृति प्रेमी को चाहिए। पहाड़ की तराई में एक डैम है, चोटी पर भी एक डैम है जिन्हें क्रमशः अपर एवं लोअर डैम के नाम से जाना जाता है। दोनों के बीच की दस किमी की दूरी पहाड़ों पर बने रास्तों पर करनी पड़ती है। इन रास्तों पर बाइक दौडाने से बिलकुल वैसा ही अनुभव होता है जैसे हिमालय पर चलाने से, बस इनकी ऊंचाई हिमालय जैसी नहीं है।
 
           पहाड़ की चोटी पर पहुँचने से पहले एक बड़ा सा डैम दिखाई पड़ता है, उसके बाद नववर्ष का अवसर होने के कारण भारी भीड़ दिखती है। स्थानीय लोगों की ही भरमार है, गाँव वालो ने अपने-अपने दुकान लगा रखे हैं। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में सुबह के वक़्त नाश्ते में एक चीज हर जगह आपको मिलेगी, और वो है आलुचोप के साथ मूढ़ी। वैसे मुझे भी यह बेहद पसंद रहा है। 
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                अयोध्या पहाड़ के नजदीक एक जलप्रपात भी है लेकिन इसके लिए आपको डैम वाले पहाड़ से उतर कर एक अन्य पहाड़ पर चढ़ना पड़ेगा परन्तु उस तरफ जाने वाली सड़क बड़ी धूलभरी है। पांच-छः किमी तक किसी तरह बाइक चला हम उस प्राप्त के नजदीक आये, भीड़ तो कोई कम नहीं थी। गिरते जल की धारा देखने के लिए एक-डेढ़ सौ फीट नीचे उतरना था। खैर, यह  जलप्रपात कुछ ख़ास रास न आया। 
   तो फिर चलिए इन चित्रों के माध्यम से इनका भ्रमण किया जाय  ;---













अयोध्या पहाड़ की यात्रा के कुछ वीडियो भी मैंने बनाये हैं जिनका लिंक इस प्रकार है :--



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  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (31-01-2018) को "रचना ऐसा गीत" (चर्चा अंक-2865) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया शास्त्रीजी !!!

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