कुम्भरार: पाटलिपुत्र के भग्नावशेष (Kumbhrar: The Ruins of Patliputra)

पाटलिपुत्र या आज का पटना अपने अन्दर अनेक एतिहासिक विरासतों को समेटा हुआ है। किसी काल में मौर्य शासकों की राजधानी होने के कारण सदा से ही यह शहर एतिहासिक चर्चा एवं अध्ययन का विषय रहा है। लेकिन क्या आपको पता है की इस शहर के इतिहास के बारे हमें इतनी सारी जानकारियां कहाँ से मिली है? आखिर वो कौन सी जगह जिसके गर्भ में प्रभावशाली मगध साम्राज्य के अवशेष दब गए और इतिहास बन गए? और दो-तीन हजार वर्षों बाद भी हमारी उत्सुकता और शोध का विषय बने हुए हैं?  

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                                प्राचीन काल में पाटलिपुत्र को पाटलिग्राम, पाटलीपुर, कुसुमपुर, पुष्पपुर, कुसुम्ध्वज आदि नामों से विभूषित किया जाता रहा है। छठी सदी पूर्व यह मात्र एक गाँव के रूप में था जिसे निर्वाण से पहले गौतम बुद्ध ने एक निर्माणाधीन दुर्ग के रूप में देखा था।

                                        पटना रेलवे स्टेशन से मात्र पांच किलोमीटर दूर स्थित कुम्भरार की खुदाई में ऐसे अनेक प्रमाण मिले हैं, जो इस प्राचीन शहर के गौरवमयी इतिहास को दर्शाते हैं। मौर्य वंश के गढ़ इस शहर में आज भी लगभग 600 ई.वी. पूर्व के अवशेष देख पाना काफी दिलचस्प है। आज यह स्थल एक पार्क (कुम्भरार पार्क) के रूप में देखा जा सकता है। इसका निर्माण मगध नरेश अजातशत्रु ने वैशाली के लिच्छिवी  गणराज्य से मगध की सुरक्षा के लिए किया था।  फिर इसकी भौगोलिक स्तिथि से प्रभित होकर अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने पांचवी सदी पूर्व मगध की राजधानी राजगृह (राजगीर) से पाटलिपुत्र स्थानांतरित करवा दिया। शिक्षा, व्यापार और धर्म के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण केंद्र था। चन्द्रगुप्त के शासनकाल में यहाँ जैन विरागियों की संगती आयोजित की जाती थी, जबकि अशोक के शासन में यहाँ तृतीय बौद्ध संगती का आयोजन किया गया था। लेकिन कुछ विद्वान ऐसा भी मानते हैं की प्रारंभिक पाल युग में भी पाटलिपुत्र ही राजधानी थी, फिर राजधानी के रूप में इसकी पहचान समाप्त हो गयी।

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                         यह शहर अनेक प्रतिभाशाली व्यक्तियों का भी कार्यक्षेत्र रहा है, जिनमे अर्थशास्त्री कौटिल्य (चाणक्य), महाभाष्य के रचयिता पतंजलि के नाम उल्लेखनीय है। पांचवी सदी के प्रसिद्द यात्री फाहियान ने इसका वर्णन एक वैभवशाली शहर एवं ख्यातिप्राप्त शिक्षा केंद्र के रूप में किया है।

     चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में आये एक सुप्रसिद्ध यूनानी राजदूत मेघस्थानिज की पुस्तक “इंडिका” में पहली बार पाटलिपुत्र में नगर व्यवस्था के बारे जानकारी मिलती है। उसने पाटलिपुत्र के लिए पालीबोथ्रा शब्द का प्रयोग किया है। उसके अनुसार यह शहर समान्तर चतुर्भुज जैसा था, गंगा किनारे लगभग अठारह किमी तक लम्बा सा, जिसे लकड़ी के बड़े बड़े स्तंभों या सुरक्षा प्राचीर द्वारा सुरक्षित किया गया था। उसने चंद्रगुप्त के के काष्ट निर्मित राजभवन का भी उल्लेख किया है। कुम्भरार के अलावा कुछ अन्य स्थलों जैसे की लोहानीपुर, बहादुरपुर, संदलपुर तथा बुलंदीबाग़ में भी खुदाई किये गए है, जिनसे हमें काष्टनिर्मित सुरक्षा प्राचीरों के अवशेष प्राप्त हुए है।

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                                 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा प्रोफेसर डी बी स्पूनर द्वारा सन 1912-15 के बीच की गयी खुदाई में पाटलिपुत्र की अनेक प्राचीन निशानियाँ प्रकाश में आयीं। विद्वानों के अनुसार इन अवशेषों का वर्णन सम्राट अशोक का महल, मौर्य राजाओं का सिंघासन कक्ष, रंगमहल, सभाकक्ष आदि के रूप में किया गया है। किन्तु सर्वाधिक मान्य मत के अनुसार यह तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में आयोजित तृतीय बौद्ध संगती हेतु निर्मित सभागार था। इस खुदाई में किसी भवन के 72 स्तम्भ प्राप्त हुए थे। पुनः 1951-55 की खुदाई में आठ स्तम्भ और मिले। इसी कारण से अस्सी स्तंभों वाला सभागार अत्यंत प्रचलित है। इसके अतिरिक्त चार और स्तम्भ भी मिले थे जो संभवतः द्वार मंडप के थे। ये स्तम्भ उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के चुनार के खदानों के बलुआ पत्थर से निर्मित थे और इनमे एक विशिष्ट मौर्यकालीन चमक भी थी। हर स्तम्भ बत्तीस फुट ऊँचा था और नौ फुट जमींदोज था। सभागार की फर्श व् छत भी काष्ट निर्मित थे। सभागार के प्रवेश द्वार पर साल के लकड़ियों से बने सात चबूतरे और सीढियां थी जो सोन नदी से जुडी हुई थी। इनका प्रयोग विशिष्ट आगंतुक नौका द्वारा सभागार तक पहुचने के लिए करते थे।  

                                               इनके अलावा सन 1951-55 की खुदाई में एक आरोग्य विहार यानि चिकित्सालय के भग्नावशेष मिले हैं जिसे चौथी-पांचवी सदी में निर्मित किया गया था। इसकी पहचान एक अंडाकार मृण्मय मुद्रांकन या टेराकोटा सीलिंग पर अंकित अभिलेख द्वारा की गयी है। इस पर ब्राम्ही लिपि में आरोग्य विहारे भिक्षुसंघ्सय लिखा हुआ है। एक मृद भांड भी मिला है जिसपर धन्वन्तरे लिखा हुआ है। ऐसा माना जाता है की इस चिकित्सालय का सञ्चालन गुप्तकाल के प्रसिद्द वैद धन्वन्तरी द्वारा किया जाता था।

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                      कुम्भरार की खुदाई में कुछ अन्य चीजें जैसे की ताम्बे के बर्तन व् आभूषण, सिक्के, पकी मिट्टी के बर्तन, हाथी दांत के सामान, मुद्राएँ, खिलौने, पशु आकृतियाँ आदि भी प्राप्त हुए हैं। 
उत्खनन द्वारा प्राप्त संरचनाओं में अधिकतर काफी निचली सतह में स्थित होने के कारण जल-जमाव की समस्या से ग्रषित थे, इसीलिए दर्शकों द्वारा अवलोकन हेतु इन्हें मूल संरचना में ही आवश्यकतानुसार उन्नयन कर दिया गया है। निकट ही एक औषधीय उद्यान भी विकसित किया गया है। कुम्भरार पार्क के अन्दर एक छोटा सा संग्रहालय भी है जहाँ खुदाई से प्राप्त कुछ सामग्रियां रखी गयीं हैं।
आईये देखें पटना और पाटलिपुत्र के कुछ झलकियाँ —

कुम्भरार संग्रहालय के अन्दर की कुछ झलकियाँ 
खुदाई से प्राप्त सामग्रियां, स्तम्भ, आदि 

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