क्यों बनें घुमक्कड़? (Why To Be A Traveller)

घुमक्कडी या घूमना जिसे आम तौर पर लोग महज एक शौक के रूप में ही देखते हैं, वास्तव में यह इससे कहीं बढ़कर है। आम तौर पर घूमने वाले दो किस्म के होते हैं। एक साधारण पर्यटक होते है, छुट्टी लेकर साल में एकाध बार किसी यात्रा पर निकलते हैं। और एक वे होते हैं जिनका घूमना जूनून होता हैं। वे किसी नियम या कार्यक्रम में बिना बंधे हुए अकस्मात् कभी भी कहीं भी निकल सकते हैं। घुमक्कड़ प्रायः कम और सिमित संसाधनों में ही यात्रा करते हैं, जबकि पर्यटक सुख सुविधाओं से लैस होकर। वैसे पर्यटक और घुमक्कड़ के बीच क्या अंतर है,

यह तो एक बहुत बड़ा विषय है जिसपर काफी लंबा लिखा जा सकता है। वाल यह है की आखिर घूमने की जरुरत ही क्या है? अगर पैसे खूब हैं तो आराम से घर में सारे भोग विलास के साधन जुटा कर मजे की ज़िन्दगी काटी जा सकती है। फिर क्या जरुरत है घर से बाहर निकल कर परेशानी उठाने की? यात्रा का जोखिम उठाने की? बस, रेल या हवाई जहाज सब जगह जोखिम ही जोखिम तो है! आज का दौर तो दुर्घटनाओं का दौर है भाई, फिर क्यों न घर में ही “सुरक्षित” रह लिया जाय? आखिर क्यों यह पोस्ट लिखने को मैं आज मजबूर हुआ?           

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         मनुष्य स्वभाव से ही एक अति जिज्ञासु प्राणी रहा है। इस जिज्ञासा ने न जाने इंसान को क्या क्या करवाया! प्रकृति या उसके स्वयं के इतिहास को भी सुलझाने में उसने वर्षों तक संघर्ष की। अनेक वैज्ञानिकों, इतिहासकारों आदि ने सदियों से मनुष्य जाति के गूढ़ रहस्यों से पर्दा उठाने में अपनी जीवन की आहुति दी है। आज जिन तथ्यों को आराम से हम इंटरनेट पर खोज कर एक झटके में पढ़ लेते है, कभी सोचा है की वे जानकारियां आखिर कितने लंबे संघर्ष के फलस्वरूप प्राप्त हुई है?                  

     आप दुनिया के बड़े बड़े महान व्यक्तियों को देख लीजिये, उनका जीवन कैसा था। क्या सिर्फ एक जगह रहकर वे इतने महान बने होंगे या उनका बौद्धिक स्तर उतना ऊँचा हुआ होगा! बुद्ध, सुकरात आदि जैसे लोग हों या न्यूटन, आईंस्टीन, डार्विन जैसे बड़े वैज्ञानिक- सभी ने अपने अपने लक्ष्यों को पाने में घुमक्कडी का ही सहारा लिया है। जब तक उन्हें अपने कर्म से संतुष्टि न हुई, यहाँ-वहाँ भटकते ही रहे। नए नए चीजों की तलाश करते गए और परत दर परत रहस्यों को कुरेदते चले गए। तभी जाकर वे महान दार्शनिक या वैज्ञानिक कहलाये।

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     सारांश यह है की यह पुस्तकों को पढ़ लेना काफी ही नहीं है। अपनी आँखों से देखा हुआ ज्ञान ही सवोत्तम ज्ञान होता है। मान लिया जाय की आपने कहीं बर्फीले पहाड़ के बारे पढ़ा। लेकिन जब तक ऐसी जगह वास्तव में देखने को न मिले, आप उसकी अनुभूति नहीं कर सकते, वो सिर्फ किताबी ज्ञान बन कर रह जायगी।                

            इस प्रकार हम देखते हैं की इस दुनिया को भली भांति आत्मसात् करने के लिए घुमक्कड़ी एक अत्यंत आवश्यक हथियार है। घुमक्कड़ी के कुछ अन्य फायदे इस प्रकार हैं-  

(1) घुमक्कड़ी से आप नयी चीजों को खुद अपनी आँखों से देखते हैं जिससे आपको अपने ज्ञान पर आत्मविश्वास बढ़ता है। समझने की क्षमता अधिक विकसित होती है।  

(2) घूमने के दौरान जो परेशानियाँ आती हैं, उनसे सहनशीलता में वृद्धि होती है। अपने आरामदायक क्षेत्र (Comfort Zone) से बाहर जाने की परीक्षा होती है।  

(3) योजना बनाने के तरीकों का ज्ञान होता हैं। खर्च और उपलब्ध संसाधनों के नियंत्रण पर प्रयोग होता है।  

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(4) नए लोगों के साथ साथ नयी नयी संस्कृतियाँ भी देखने को मिलती हैं। सामाजिक दायरा बढ़ता है।  

(5) घुमक्कड़ी इस बात का एहसास करा देता है की इस असीम दुनिया में हम कितनी छोटी सी जगह घेरते हैं! यह बात तो किसी महापुरुष ने भी कही है!  

(6) आज़ादी की असली अनुभूति होती है। व्यक्तित्व के विकास में काफी मदद मिलती है।

  (7) नए नए जगहों पर नयी नयी चीजों को आजमाने और करने का मौका मिलता है।  

(8) यात्रा से शारीरिक थकावट होती है, लेकिन साथ ही शरीर की अतिरिक्त उर्जा की भी खपत होती है, जिससे स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। दोस्तों! इनके अलावा भी घुमक्क्ड़ी के बहुत सारे फायदे हैं ,बहुत सारी बातें हैं, जिन्हें मैं आपसे कमेंट के माध्यम से जानना चाहूंगा!

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14 thoughts on “क्यों बनें घुमक्कड़? (Why To Be A Traveller)

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (26-07-2017) को पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है; चर्चामंच 2678 पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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