जमशेदपुर से दीघा तक- नैनो और पल्सर (Jamshedpur to Digha: 300km by Nano and Bike)

जी हाँ! ज़िन्दगी है सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना! कहाँ आपको सबसे ज्यादा मजा आता है? बस, ट्रेन या हवाई जहाज? आपने कभी दुपहिया से कोई लंबी यात्रा की? अगर की है तो फिर लगा ही होगा की ज़िन्दगी है सफ़र….
अरे भई मैं भी कोई बहुत बड़ा बाइकर नहीं हूँ लेकिन एक बार ही ऐसा मौका मिला था मुझे जमशेदपुर से दीघा तक तीन सौ किलोमीटर अपने पल्सर से नापने का! तो हुआ कुछ यूँ की दोस्तों के बीच बातों ही बातों में एक दिन कार्यक्रम बन गया कुछ ऐसा ही।

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Panchghagh Falls: The safest waterfall near Khunti-Ranchi in Jharkhand

जनवरी 2014 की एक सर्द सुबह को हम छह लोग जिसमें दो लोग यानि मैं और शहंशाह पल्सर पर और चार लोग नैनो से निकले पुरानी डगर पे नए तरीके से। आठ बजे की सुबह सुबह जैसे ही बाइक पर हम बैठे ठंडी हवा के झोंकों ने हमें ठंडा करने का पूरा प्रयास किया लेकिन हमारा जोश था ऐसा की हवा की सारी बेरुखी धराशायी होते गयी। बाकि के चार लोग तो नैनो के अंदर आराम से दुबक गए थे। रास्ता किसी को पता नही था, सिर्फ तकनीक यानि की मोबाइल जीपीएस का सहारा था।

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जमशेदपुर से दीघा तक- नैनो और पल्सर (Jamshedpur to Digha: 300km by Nano and Bike)

यहाँ से दीघा जाने के लिए दो रस्ते थे एक खड़गपुर होते हुए और एक रायरंगपुर होते हुए। लेकिन खड़गपुर वाले हाईवे के ख़राब होने के कारण हमने रायरंगपुर वाले रस्ते को ही चुना। जमशेदपुर से धीरे धीरे निकलते हुए हम शहर से बाहर हो गए और अब रास्ता बिलकुल साफ था कोई भीड़ भाड़ नहीं। एकदम चिकनी सड़क देखकर तो हम दोनों बाइकर फुले नहीं समा रहे थे और नैनो वाले लोग जल रहे थे की काश वो भी अपने अपने बाइक से ही निकलते! जोश जोश ने मैंने पल्सर की स्पीड को 90 के पार सटा दिया! लेकिन जरा संभल कर! उधर नैनो के मालिक एवं ड्राईवर रवि ने भी पूरा जोर लगा कर गति को सौ के पार ले जाने का बीड़ा उठा लिया।

यहाँ तो पल्सर और नैनो में ही प्रतिस्पर्धा हो गयी। कभी नैनो आगे कभी पल्सर। अब लगा की थोड़ा विश्राम कर लिया जाय और हम रुक गए एक जगह पर जिसका नाम है तिरिलडीह। जीपीएस देखा तो पाया की अभी तो 50-55 किमी ही तय हुआ है, इसका पांच गुना और तय करना है। फिर से हमारी टीम आगे बढ़ी। कहीं पहाड़, कहीं गांव, कही पुल… क्या आनंद था इनका! झारखण्ड की सीमा ख़त्म हो गयी और हम उड़ीसा में प्रवेश कर चुके थे। यहाँ की सड़कें तो और लाजवाब थीं।

स्वर्णिम चतुर्भुज वाले पथ पर मैंने पहली बार अपनी पल्सर से 106 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार को छुआ। रायरंगपुर, फिर आया बारीपादा, बालासोर और जलेश्वर। सफ़र का आनंद लेते हुए अंततः अब उड़ीसा पार करके बंगाल में प्रवेश कर चुके थे और दीघा के करीब आ गए थे।   जीपीएस ने हमें बिलकुल समुद्र तट पर ही पंहुचा दिया था। तट पे हमने खूब मस्ती की, उछल कूद किया, फिर कुछ देर बाद एक होटल की तलाश की। यहाँ की शाम ने हमें थोड़ी थोड़ी गोवा की याद दिला ही दी। सब थके हुए थे इसीलिए जल्दी ही खा-पी कर सब आराम करने के मूड में थे। 

दीघा में भी अनेक प्रकार की समुद्री मछलियों का आनंद आप ले सकते हैं।   अब अगली सुबह तो वापस ही जाना था लेकिन वही से 10-12 किमी की दुरी पर ही स्वर्णरेखा नदी का मुहाना भी था, इसलिए उसे भी देखकर ही जाना था। जल्दी जल्दी जीपीएस के सहारे वहाँ पहुच कर देखा तो पाया की स्वर्णरेखा कैसे बंगाल की खाड़ी में मिल रही है। 

 पहली बार किसी नदी का अंत देखा सबने। दिन के 11 बज चुके थे और जाने की हड़बड़ी थी। जल्दी से हम वहां से वापसी के लिए रवाना हुए और लगभग 6 घण्टों में थोडा मोड़ा विश्राम करते हुए शाम के सात बजे इस रोमांच को मन में संजो कर जमशेदपुर वापस पहुचे।

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