नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष: एक स्वर्णिम अतीत (Ruins of Nalanda University)

विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय के बारे तो आपने सुना ही होगा। आज से लगभग पंद्रह सौ साल पहले यह पूरी दुनिया के लिए उच्च शिक्षा का सिरमौर था, जहाँ सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन, जापान, बर्मा, कोरिया, तिब्बत, फारस आदि देशों से भी विद्यार्थी पढने के लिए आते थे। इस महान विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके वैभव का अहसास करा देते हैं। आईये जानते हैं –नालंदा विश्वविद्यालय के स्वर्णिम अतीत के बारे !


  1.   बोध गया: एक एतिहासिक विरासत (Bodh Gaya, Bihar)
  2. दशरथ मांझी: पर्वत से भी ऊँचे एक पुरुष की कहानी (Dashrath Manjhi: The Mountain Man)
  3. मगध की पहली राजधानी- राजगीर से कुछ पन्ने और स्वर्ण भंडार का रहस्य (Rajgir, Bihar)
  4. नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष: एक स्वर्णिम अतीत (Ruins of Nalanda University)
  5. कुम्भरार: पाटलिपुत्र के भग्नावशेष (Kumbhrar: The Ruins of Patliputra)                                                   

पटना से लगभग 90 किलोमीटर, गया से 85 किमी और राजगीर से 12 किमी दूर नालंदा के प्राचीन खँडहर अब भी मौजूद हैं। नालंदा रेल मार्ग द्वारा जुड़ा तो है, लेकिन राजगीर मुख्य स्टेशन है। सड़क मार्ग द्वारा भी यह आस-पास के सभी शहरों से भली भांति जुड़ा हुआ है। हमने राजगीर से बस द्वारा ही नालंदा तक का सफ़र तय किया, जिसमे भीड़ काफी होती है। यहाँ भी मुख्य सड़क से खँडहर का मुख्य द्वार तीन किमी दूर है, जहाँ तक जाने के लिए टमटम या ऑटो वाले उपलब्ध हैं। अन्दर प्रवेश करने के लिए मात्र पांच रूपये के टिकट की जरुरत पड़ती है। प्रवेश करते ही दूर से ही लाल रंग के ईंटो से बने नालंदा के अवशेष नजर आने लगते हैं। 

                                                          नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना
गुप्त शासक कुमार गुप्त प्रथम ने 450-470 ई. वी. के बीच की थी। अत्यंत सुनियोजित ढंग से एक विस्तृत क्षेत्र में बना उस काल का यह संभवतः पहला विश्वविद्यालय था जहाँ देश-विदेश से छात्र पढने आते थे। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार तब 12000 छात्र और 2000 शिक्षक हुआ करते थे। यह एक पूर्णतः आवासीय विद्यालय था। कहा जाता है की सातवीं सदी में ह्वेनसांग ने यहाँ एक वर्ष छात्र एवं शिक्षक के रूप में  व्यतीत किया था। आज की तरह ही उस ज़माने में भी यहाँ प्रवेश परीक्षा होती थी जो काफी कठिन मानी जाती थी, अत्यंत प्रतिभाशाली छात्रों को ही प्रवेश मिल पाता था। छात्र शिक्षा ग्रहण कर बाहर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। नौवीं से बारहवीं शताब्दी तक इस विश्वविद्यालय की अन्तरराष्ट्रीय ख्याति रही। लेकिन 
गुप्तवंश के पतन के बाद भी सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा।
                                                 लेकिन दुर्भाग्यवश नालंदा विश्वविद्यालय को एक सनकी-चिड़चिड़े स्वभाव वाले तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने 1199 ई. में जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया, साथ ही उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया। उसने इस विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आग लगा दिया, जिससे किताबें छः महीने तक धू-धू कर जलती रहीं। दरअसल उसने देखा की यहाँ के भारतीय वैद्यों का ज्ञान उसके हाकिमो से श्रेष्ठ है।                                    एक बार उसके हाकिम से उसका इलाज नहीं हो पाया, मज़बूरी में उसे एक बौद्ध वैद्य को बुलाना पड़ा। वैद्य ने उसका इलाज कर तो कर दिया, लेकिन फिर भी उस लुटेरे तुर्क शासक को यह बात रास नहीं आई की आखिर क्यों भला किसी भारतीय वैद्य का ज्ञान उसके हकीमों से ज्यादा हो सकता है? एहसान मानने के बजाय उसने इर्श्यावश विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया। उसने अनेक आचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को भी मार डाला। इस प्रकार नालंदा का यह स्वर्णिम इतिहास काल के गाल में समा गया। 
                                              बुद्ध के परम शिष्यों में से एक सारिपुत्र के जन्म व् निर्वाण के लिए भी नालंदा को जाना जाता है। इस संस्थान से जुड़े विद्वानों में नागार्जुन, आर्यदेव, वसुबन्धु, धर्मपाल, सुविष्णु, असंग, शीलभद्र, धर्मकीर्ति, शान्तरक्षित आदि प्रमुख हैं। प्रसिद्द चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा वृतांतों में बौद्ध भिक्षुओं की जीवनी, मंदिरों और महाविहारों की झलक मिलती हैं। धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, खगोलशास्त्र, चिकित्सा आदि यहाँ के मुख्य अध्ययन के विषय थे। अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार समकालीन शासकों द्वारा दिए गए अनेक गाँवों के राजस्व से ही इस विश्वविद्यालय का खर्च व्यय होता था। 
                                भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में यहाँ ईंट से निर्मित छः मंदिर तथा ग्यारह विहारों की श्रृंखला प्राप्त हुई है, जिसका विस्तार एक वर्ग किमी से भी कहीं अधिक ही है। आकार व् विन्यास में लगभग सभी विहार एक जैसे ही हैं। इनके अलावा खुदाई में बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ, सिक्के, हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, मृदभांड, ताम्रपत्र, भित्तिचित्र आदि भी प्राप्त हुए हैं, जो इस विश्वविद्यालय के ठीक सामने के नालंदा संग्रहालय में रखे हुए हैं। ध्यान देने वाली बात यह है की यह संग्रहालय हर शुक्रवार को बंद रहता है। 
                                                  नालंदा के गौरवमयी इतिहास का सफ़र अब यहीं ख़त्म होता है, लेकिन इन तस्वीरों के साथ——–

                                 

              इस हिंदी यात्रा ब्लॉग की ताजा-तरीन नियमित पोस्ट के लिए फेसबुक के TRAVEL WITH RD
 पेज को अवश्य लाइक करें या ट्विटर पर  RD Prajapati  फॉलो करें।
इस यात्रा ब्लॉग में आपके सुझावों का हमेशा स्वागत है। अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए मुझे [email protected] पर भी संपर्क कर सकते हैं। हमें आपका इंतज़ार रहेगा।

6 thoughts on “नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष: एक स्वर्णिम अतीत (Ruins of Nalanda University)

  1. ज्यादातर जगहों को मुगलों ने इसी तरह बरबाद किया है जैसे नालंदा को किया ! बढ़िया जानकारी लिखी अपने अपनी पोस्ट में !

  2. सबसे पहले तो ब्लॉग पर आपके पहले कमेंट के लिए धन्यवाद। नालंदा है ही अतीत का एक ऐसा ज्ञान पुंज, जिसका वर्णन कर पाना इतने कम शब्दों में काफी मुश्किल है =p~

  3. वाह!! RD जी बहुत सुन्दर वर्णन किया है आपने ऐसा लगा कुछ पल के लिए हम भारतीय इतिहास के उस स्वर्णिम काल में पहुँच गए और चित्रो का संग्रह भी अतिसुन्दर है…..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *