मुकुटमणिपुर बांध (Mukutmanipur Dam: Second largest earthen dam of India)

नदियों पर बांधों का निर्माण तो वैसे बहुत सारे उद्देश्यों के लिए किया जाता है, फिर भी इनके पीछे औद्योगिक कारण ही प्रधान होते हैं। कुछ बांध तो इतने खास बन जाते हैं की अनायास ही इनसे कब पर्यटन जुड़ जाता है, पता नहीं चलता। भारत के सबसे बड़े बांधों में टिहरी, भाखड़ा-नागल, हीराकुड, नागार्जुन-सागर आदि पहले से ही काफी प्रसिद्द हैं, और पर्यटकों को काफी लुभाते भी हैं, जबकि इनमें से किसी का भी निर्माण कदाचित पर्यटन हेतु नहीं किया गया होगा। दूसरी ओर इन बांधों के पीछे एक अन्य पहलू भी होता है, प्रकृति के साथ किये गए छेड़ -छाड़ से उत्पन्न पर्यावरण संम्बधी गंभीर समस्या जिनकी चर्चा आजकल खूब होने लगी है। कुछ बांध ऐसे भी हैं जिनके पीछे उन विस्थापितों का दर्द छुपा होता है जिनके आशियाने हमेशा के लिए जलमग्न हो गए और आज तक मदद के लिए सरकार से संघर्ष करते आ रहे हैं। खैर, जो भी हो इस दिशा में मैं ज्यादा नहीं बढ़ना चाहूंगा, ले चलता हूँ आपको झारखण्ड-बंगाल सीमा के नजदीक भारत के एक और महत्वपूर्ण बांध की ओर जिसका नाम बहुत कम लोगों ने ही सुन रखा होगा।

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  मेरे निवास स्थल जमशेदपुर से पश्चिम बंगाल के पुरुलिया तथा बांकुड़ा जिले की सीमाएं स्पर्श करती हैं। बांकुड़ा एक प्रसिद्द नाम तो नहीं है, फिर भी यहाँ ऐतिहासिक विरासत की अनेक धरोहर मौजूद हैं। कोलकाता से पश्चिम में स्थित इस शहर की दूरी कोई एक-डेढ़ सौ किमी ही होगी। बांकुड़ा जिले में ही विष्णुपुर भी है, जो मल्ल वंश से सम्बंधित स्मारकों, मंदिरों तथा टेराकोटा मंदिरों के लिए भी जाना जाता है। यह स्थल पिछले बीस वर्षों से यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किये जाने की प्रतीक्षा में है। इस जिले में बहने वाली कांग्साबती नदी पर ही वह बांध बना है जिसके बारे मैं बताने जा रहा हूँ।

       कांग्साबती नदी पुरुलिया, बांकुड़ा तथा मेदिनीपुर जिलों में बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है। आजादी के कुछ वर्षों बाद ही  क्षेत्र में सिंचाई परियोजना के तहत इस बांध का निर्माण आरम्भ किया गया था। यह भारत का एक बड़ा “मिटटी का बांध या कच्चा बांध” है। मिटटी का बांध कहने का यह मतलब बिलकुल नहीं की यह खेतो के मेढ़ की तरह सिर्फ मिटटी का ही बना होगा, बल्कि भूपर्पटी पर पाए जाने वाले पदार्थों जैसे पत्थर, क्ले, बजरी आदि का भी उपयोग अवश्य किया जायेगा, और इसके टिकाऊपन में भी कोई शक की गुंजाइश नहीं रहेगी। यही कारण है की अंग्रेजी में इसे “Earthen Dam” कहा जाता है, परन्तु इसके हिंदी अनुवाद से कुछ भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। इसी तरह का एक और बांध केरल के वायनाड जिले में बाँसुरा बांध है, जो भारत में सबसे बड़ा अर्थ डैम है, जबकि यह मुकुटमणिपुर बांध इस श्रेणी में दूसरे नंबर पर है।

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                             पिछले कई वर्षों से मेरे मित्र जमशेदपुर से अपनी-अपनी बाइक से ही मुकुटमणिपुर बांध के दर्शन करते आये है, लेकिन मुझसे ये अब तक अछूता ही था। अंततः इस वर्ष की पहली तारीख यानि एक जनवरी को ही यह काम भी पूरा हो गया। पिकनिक के पिक समय में इस बांध के आस-पास लोगों की अपार भीड़ रहती है, इसलिए यह दिन इस यात्रा के लिए एकदम उपयुक्त था। जमशेदपुर से करीब डेढ़ सौ किमी की दूरी तय करने में हमें कोई चार घंटे लगे। आधे रास्ते झारखंड और आधे बंगाल के। मुख्यतः गावों से गुजरते हुए हरे-भरे जंगल से भरे रास्ते। हाईवे संख्या 33 के उस पार एक सड़क जाती है- डिमना लेक की ओर। जो भी जमशेदपुर के बारे जानते होंगे, इस झील के बारे भी जरूर जानते होंगे। कुछ दूर हलके-फुल्के पहाड़ी रास्ते भी हैं इधर, फिर झील के किनारे-किनारे कुछ किलोमीटर तक हमारी बाइक दौड़ती है। तीस किमी दूर पटमदा नाम का एक छोटा सा गाँव है, जहाँ से अधिकतर सब्जियों की आपूर्ति जमशेदपुर में की जाती है। इसके कुछ देर बाद हम पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं।

बंगाल की सड़कें तुलनात्मक रूप से झारखंड की सड़कों से कई गुना बेहतर हैं। यह बांकुड़ा जिला है और इस जिले में प्राकृतिक नजारों के साथ ही ऐतिहासिक स्थल भी मौजूद हैं, परन्तु हमारा आज का लक्ष्य सिर्फ मुकुटमणिपुर बांध तक ही था। झिलमिली नाम के एक प्रसिद्द पर्यटन स्थल के लिए जाने वाली सड़क भी हमें दिखाई दे गई, झिलमिली इधर लोगों के लिए एक बढ़िया पिकनिक स्पॉट है जहाँ नदी, जंगल, पहाड़ सब कुछ मौजूद है। आज साल का पहला दिन होने के कारण रास्ते भर कई स्थानों पर लोगों का हुजूम इन स्थलों की तरफ बढ़ता दिखाई पड़ा।

दोनों तरफ के हरे-भरे नजारों के साथ चलते-चलते मुकुटमणिपुर अब अधिक दूर न रहा। आज एक जनवरी था इसलिए मेले जैसी जबरदस्त भीड़-भाड़ थी। बांध से कुछ पहले सड़क पर एक तोरण द्वार है जिसपर लिखा है “कांग्साबती बांध परियोजना में आपका स्वागत है”, परन्तु बोलचाल में हम तो इन्हें मुकुटमणिपुर डैम के ही नाम से जानते हैं। आज के दिन डैम के ऊपर वाली सड़क पर चार पहिये वाहनों को जाने की अनुमति नहीं थी, परन्तु बाइक वालों को थी, हमें राहत महसूस हुई। 

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     जी हाँ, यह डैम कोई छोटा-मोटा डैम नहीं, डैम के ऊपर जो सड़क है वो ग्यारह किमी लम्बी है! बांध के दूसरे छोर को देखने के लिए एक लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है। इस विशाल से जलाशय के बीच कुछ छोटे-छोटे टापू भी हैं, जहाँ लोग पिकनिक मना रहे थे। आस-पास की पहाड़ियों को परेसनाथ की पहाड़ियां कहा जाता है। एक छोटी सी पहाड़ी पर पर्यटकों के विश्राम के लिए शानदार सा व्यू पॉइंट बना हुआ है, जहाँ से इस बांध की विशाल जलराशि का शानदार दीदार किया जा सकता है।

मुकुटमणिपुर में यात्रियों के ठहरने के लिए वैसे कुछ छोटे-मोटे होटल भी शुरू हो गए हैं, लेकिन हमारा यहाँ रुकने का कोई कार्यक्रम नहीं था तो हमने उस तरफ ज्यादा खोज-बिन भी नहीं की। खाने-पीने के लिए भी कुछ ढाबे उपलब्ध हैं आजकल। धीरे-धीरे यह एक पर्यटन स्थल में विकसित होता जा रहा है। सार्वजनिक परिवहन से यहाँ आने के लिए बांकुड़ा तक ट्रेन या बस से आया जा सकता है, फिर बस द्वारा मुकुटमणिपुर।

कुछ घंटे इस बांध के इर्द-गिर्द बिताने के बाद वापस उसी रास्ते घर की ओर रवाना होने का समय आ गया, अगले पोस्ट में चलते हैं किसी अन्य रमणीय स्थल की तरफ।

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