रंगत की काली रात और सुबह बाराटांग में चूने पत्थर की सफ़ेद गुफाएं (Night stay at Rangat and Lime Stone Caves of Baratang)

रॉस एंड स्मिथ देखने के बाद उसी दिन मुझे रंगत के लिए निकलना था, रात भी वहीं बितानी थी। दोपहर बारह बजे डिगलीपुर बाजार में भोजन करने के बाद बस स्टैंड की तरफ बढ़ चला। डिगलीपुर से रंगत के लिए एक दिन पहले ही मैंने सरकारी बसों में अग्रिम टिकट की बुकिंग करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने कहा कि अग्रिम टिकट सिर्फ डिगलीपुर-पोर्ट ब्लेयर के लिए ही मिलती है। साथ ही अंतिम सरकारी बस निकल भी चुकी थी, इसलिए अब प्राइवेट बस का ही भरोसा था। पूछते-पूछते एक बस आखिर मिल ही गयी, ये भी अंतिम प्राइवेट बस ही थी, एक बजे निकलने वाली थी। बस में देखा, एक-दो सीट बची थी, तुरंत कब्जा कर लिया…लोकल लोगों की बड़ी भीड़ थी। 

           बस ठीक एक बजे निकल ही रही थी, की घर से फोन आया कि किसी ने संजय नाम से फोन किया है और मेरा फोन न लगने के कारण घर में कहा कि कुछ जरूरी बात करनी है। मुझे समझ न आया भला कौन संजय हो सकते हैं? पांच मिनट बाद हमारे घुमक्कड़ी दिल से समूह के एक सदस्य संजय सिंह जी का फोन आया और कुशल क्षेम पूछी। उन्हें कहा “अंडमान में सब कुछ ठीक ठाक तो है? मैंने कहा “हाँ, सब ठीक ठाक ही है, कोई खास बात है क्या? फिर उन्होंने कहा कि अंडमान में भूकंप की खबर मिली है। लेकिन यहाँ तो सब कुछ सामान्य ही था, अगल-बगल पूछा, किसी को भूकंप के बारे कुछ पता न था। खैर, हो सकता है हल्का-फुल्का आया भी हो, हमें महसूस न हुआ हो। फिर भी जब हम कहीं बाहर होते हैं, जरा सा भी कुछ अशुभ सुनने पर स्वाभाविक चिंता हो जाती है। सारे करीबी सगे-संबंधी-दोस्त-यार किसी ने सूचना न दी, पर घुमक्कड़ी दिल से समूह से ही पहली सूचना मिली। इस घटना ने एक बार फिर से मुझे घुमक्कड़ी दिल से समूह का सदस्य होने पर गौरवान्वित किया।

डिगलीपुर से रंगत करीब 150 किमी दूर है, यानी चार घंटे का सफर। बस अपने सही रफ्तार में थी। रंगत में जो कुछ भी घूमने लायक जगह हैं, वे रंगत के मुख्य बाजार से 20 किलोमीटर पहले ही है। रंगत से तीस-चालीस किमी पहले काफी देर तक सड़क बिल्कुल समुद्र के किनारे किनारे ही चलती है। बड़ा सुहावना नजारा होता है। वोरिसडेरा तट और आमकुंज तट तो बस में बैठे बैठे ही देख लिया। अगर अभी न देखते तो फिर से ऑटो बुक कर वापस इधर आना पड़ता, यानी दोहरा काम। समय भी अधिक न था रंगत में बिताने को। इसके बाद हाईवे पर ही वन विभाग द्वारा धनिनाला मैन्ग्रोव कैनोपी वाक नामक एक बगीचा बनाया गया है, जहां मैन्ग्रोव के पेड़ों के बीच लकड़ी का पैदल वॉल्कवे पुल बनाया गया है। रंगत में अंडमान टूरिज्म वाला सरकारी गेस्ट हाउस हस्कबिल नेस्ट भी सड़क किनारे ही है। ये सब देखने के लिए मैंने इस बस को छोड़ तो दिया, पर मोबाइल का चार्ज खत्म देख मूड खराब भी हो गया, फोटो लेने में असमर्थ था। 

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             दूसरी बस पकड़ शाम के पांच बजे रंगत बाजार उतर गया। रंगत में भी होटल की अग्रिम कोई बुकिंग न थी..क्योंकि इंटरनेट पर जो भी थे वे महंगे थे, सस्ते वाले नेट पर डालते नहीं। डिगलीपुर की भांति रंगत में भी सस्ते लॉज तीन-चार सौ रुपये में आसानी से मिल जाएंगे। एक आर जी लॉज का विज्ञापन मैने पोर्ट ब्लेयर से आते समय ही देख रखा था, तो रंगत आते ही उसी लॉज की ओर चल दिया। मात्र तीन सौ रुपये में ही बड़ा बढ़िया कमरा दिया उन्होंने, एकदम घुमक्कड़ों के लायक! सबसे पहले तो मोबाइल को चार्ज पर लगाया।        

      रंगत के सारे दर्शनीय स्थल तो मुख्य कस्बे से 20 किमी दूर हैं, बस में बैठे बैठे उनकी झलक ले ही चुका था। दुबारा जाने का मूड भी न था। शाम हुई, पर अंधेरा हुआ न था। रंगत का बाजार ही देखने निकल पड़ा। भले ही यह एक छोटा शहर हो, पर जरूरत की सारी चीजें उपलब्ध थी यहां। कुछ काम न बचा तो फलों और सब्जियों के भाव ही पूछ लिया। छोटे वाले केले सिर्फ तीस रुपये दर्जन और सेब-अंगूर चार सौ रुपये किलो! दरअसल अंडमान में केला और नारियल ही तो उपजता है, बाकी सारा कुछ मुख्य भूमि से, तो महंगाई लाजिमी है। पर दक्षिणी अंडमान की तुलना में इधर का बाजार कुछ सस्ता जरूर है। रंगत में सबसे आश्चर्यजनक जो मुझे लगा वो है यहां का बस स्टैंड। ये बस स्टैंड किसी बड़े महानगर के बस स्टैंड जैसा नया-नया चमक रहा था, ऐसा तो पोर्ट ब्लेयर में भी नही था। बाकी फोटो देखकर आप खुद समझ ही जायेंगे।    

     दो-तीन घंटे बाजार में भटकने के बाद थकान महसूस होने लगी। लगातार एक हफ्ते से मछली खाकर बोर हो चुका था, इस बार एक छोटे से ढाबे में भोजन किया- पराठे-चटपटी का। पराठे का मतलब वो उत्तर भारत वाला आटे का बना नही, बल्कि मैदे का बना, केरल पराठे अगर आपने कभी खाये हों, तो ये उसी का छोटा भाई है। और साथ मे मटर के छोले को यहाँ चटपटी कहा जाता है। प्लेन आटे की रोटी भी मिलती है, पर अंडमान के पराठे भी तो चखने थे एक बार।      

                 सुबह चार बजे ही नींद खुल गयी, पांच बजे बस पकड़नी थी, बाराटांग के लिए। परन्तु रंगत से सीधे बाराटांग वाली बस का इंतज़ार करना जरुरी नहीं था। रंगत से बाराटांग के बीच अंडमान ट्रंक रोड की एक जलधारा को पार करना पड़ता है, उत्तरा जेट्टी से गाँधी घाट जेट्टी। रंगत से लोकल बस पकड़ी और तीस किमी दूर उत्तरा उतर गया। फिर जहाज से जलधारा पार की, गाँधी घाट पर दूसरी बस बाराटांग के लिए पकड़ ली। यह दूसरी बस पोर्ट ब्लेयर जाने वाली एक्सप्रेस बस थी, लोकल नहीं। कंडक्टर ने तीस रूपये लेकर पच्चीस का टिकट दिया। मैंने आपत्ति जताई, तो कहा की ये एक्सप्रेस है, तर्क करोगे तो पोर्ट ब्लेयर तक का किराया लगेगा, पुरे सौ रूपये। मैंने जाने दिया।          

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            गांधी घाट से बाराटांग भी कोई चालीस किमी रहा होगा, घंटे भर में बाराटांग पहुँच गए। इस प्रकार रंगत से बाराटांग की कुल दूरी लगभग सत्तर किमी हुई और समय लगा कुल तीन घंटे। बाराटांग में तो जबरदस्त भीड़-भाड़ थी। लाइम स्टोन की गुफाएं देखने के लिए सब आये थे। इतनी लम्बी लाइन अभी तक अंडमान में कहीं नहीं देखी थी। बाराटांग बोट एसोसिएशन वालों के काउंटर पर बड़ी धक्का मुक्की थी, छह सौ रूपये प्रति व्यक्ति का टिकट था। टिकट तो किसी तरह मिल गयी, पर मैं ठहरा अकेला। एक अन्य ग्रुप के साथ मुझे जोड़ा गया, फिर बोट का नाम मिला, टिकट के बाद सामने के वन विभाग के ऑफिस से परमिट भी लेना था। परमिट लेने के लिए भी एक पहचान पत्र की कॉपी के साथ एक फॉर्म भरना पड़ा, दस मिनट लाइन में लगने के बाद मेरा नंबर आया। टिकट के बाद ये परमिट लेने का सिस्टम हर जगह है, क्योंकि पर्यटक दूर टापू पर जाते हैं, अगर कोई छूट गया या गुम हो गया, तो उसकी खोज करने में आसानी होगी। कुछ वर्षों पहले ही लाइफ जैकेट पहनना अनिवार्य किया गया है, पहले तो ऐसे ही चले जाते थे।  

                              ऐसी छोटी जगहों पर छोटी नाव चढ़ने के लिए पोर्ट ब्लेयर जैसी स्थायी जेट्टी नहीं होतीं बल्कि प्लास्टिक का बना तैरता हुआ प्लेटफार्म होता है, जिसपर चलने से यह हिलती-डुलती भी है, पर डर की कोई बात नहीं। बाराटांग जेट्टी से लाइम स्टोन गुफा की दूरी कोई आठ-नौ किमी है, लगभग पच्चीस मिनट तक नाव यात्रा का आनंद मिला। दोनों तरफ मैन्ग्रोव के घने जंगल के साथ-साथ।                  

              गुफा भी कोई तट के बिलकुल किनारे नहीं, मैन्ग्रोव के पेड़ों के मध्य ही गुजर कर लकड़ी की जेट्टी पर उतर कर चलना होता है, तब जाकर सुखी जमीन मिलती है। एक छोटा सा गाँव जैसा ही है कुछ, पर्यटक आते हैं, इसलिए स्थानीय लोगों ने दोनों तरफ निम्बू पानी वगैरह के दुकान खोल रखे हैं। दो किलोमीटर पैदल ट्रैक करने के बाद गुफा के दर्शन होने प्रारम्भ हुए।      

                          गुफाएं तो चूने पत्थर की बनी है, प्राकृतिक रूप से, लाखों वर्ष पहले। अभी भी ये लगातार बन ही रही है, बड़ी हो रही हैं। वैज्ञानिकों का मत है की चूने के पहाड़ो पर वर्षा जल के घुलने-मिलने के कारण उनमें क्षरण हुआ, दरारों ने कालांतर में गुफाओं का रूप ले लिया। बोट चलाने वाला ही हमारा गाइड भी था, उसने कुछ-कुछ बताना शुरू किया। चूने के बने होने के कारण इनका रंग प्राकृतिक रूप से सफ़ेद ही है, पर लोगों ने छू-छू कर इन्हें गन्दा और काला कर दिया है। ऊंचाई पर जो हिस्से हैं वे सफ़ेद ही हैं, और चमक भी रहे हैं। गुफाओं के पत्थरों ने बहुत सारी आकृतियां ग्रहण कर ली हैं, सोचने से हर आकृति पर कोई न कोई शक्ल नजर आती है। कोई बिच्छू जैसा लगता है, कोई कमल के फूल जैसा, कोई इंसान जैसा भी। जितनी कल्पना, उतने चेहरे।

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               घण्टे भर के गुफा दर्शन के बाद वापस फिर से दो किलोमीटर चलकर बोट के पास जाना था। इसी दौरान रॉस एंड स्मिथ में जिस परिवार के साथ मैंने यात्रा की थी, वे भी दिख गए। शायद हमलोगों का कार्यक्रम समान्तर ही चल रहा था! बोट से वापस बाराटांग जेट्टी आने में दूरी का पता न चला, वापसी में अक्सर वही दूरी कम महसूस होने लगती है।                    

  अब सीधे पोर्ट ब्लेयर वापस निकलने की बारी थी, यहाँ दूसरी जलधारा पार की, फिर मिडिल स्ट्रैट जेट्टी पर बस ढूँढना शुरू किया। साढ़े बारह बजे की कॉन्वॉय के लिए सभी बसें लाइन में खड़ी थी। पर किसी भी बस में पोर्ट ब्लेयर की एक भी सीट न बची थी। सभी बसें लम्बी दूरी वाली थी, कोई डिगलीपुर से आ रहा था, कोई मायाबंदर से। लेकिन डिगलीपुर से पोर्ट ब्लेयर की वापसी यात्रा मैं टुकड़ों में कर रहा था, इसलिए सीट मिलनी मुश्किल थी। अगला कॉन्वॉय तीन बजे था, उसका इंतज़ार करना बेवकूफी होता, क्योंकि तीन घंटे में तब तक पोर्ट ब्लेयर पहुँच जाता। सबसे आगे खड़ी प्राइवेट बस में ही चढ़ा, खड़े-खड़े लगभग दो घंटे किसी तरह काटे। इस स्थिति ने मुझे थोड़ा सा परेशान किया, पर पोर्ट ब्लेयर पहुँचने से एक घंटे पहले एक यात्री ने उतरकर सीट छोड़ी, तब जाकर कुछ आराम मिला।                    

          तीन बजे पोर्ट ब्लेयर आया। शाम को कोई विशेष कार्यक्रम न था। अंडमान का आठवां दिन समाप्त हुआ, अगले दिन वंडूर तट और जॉली बॉयद्वीप जाने की योजना बनी।

रंगत मुख्य सड़क 

रंगत बस स्टैंड 

हाथियों से लठ्ठे ढुलवाये जा रहे हैं!

यहाँ से बाराटांग 

चल पड़े गुफाओं की ओर…

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