हुंडरू जलप्रपात: झारखण्ड का गौरव (Hundru Waterfalls: The Pride of Jharkhand)

झारखण्ड एक पठारी राज्य है और अपने जलप्रपातों के लिए काफी प्रसिद्द है। सबसे अच्छी बात यह है की तीन मुख्य जल प्रपात दशमफॉल, जोन्हा और हुंडरू तो राजधानी रांची के आस-पास ही हैं, बाकि कुछ अन्य प्रपात भी रांची से सौ-डेढ़ सौ किमी के अंदर ही हैं। दशमफॉल की यात्रा के बारे तो मैं लगभग साल भर पहले ही लिख चुका हूँ, जो रांची से मात्र तीस किमी की दूरी पर रांची-जमशेदपुर राजमार्ग संख्या 33 के पास ही स्थित है। जोन्हाफॉल की यात्रा तो कई वर्ष पहले की थी, और यह मेरे गांव से काफी करीब ही है। परन्तु हुंडरू जो की रांची शहर से सटा हुआ है, और रांची में कुछ वर्षों तक रहने के बावजूद भी वर्षों से इसके दर्शन नहीं हो पाए थे। सबसे बड़ा कारण इसका यह भी है की जितने भी प्रपात इस क्षेत्र में हैं, कहीं भी सार्वजनिक परिवहन की कोई सुविधा नहीं है, आपको खुद की गाड़ी या बाइक से ही जाना पड़ेगा। इसलिए जब तक बाइकिंग का नशा परवान न चढ़ा, तब तक सारे जलप्रपात मुझसे अछूते ही थे।

चूँकि झारखण्ड की सभी नदियाँ बरसाती हैं इसलिए इनके मार्ग में आने वाले जलप्रपात भी  बरसाती ही होते हैं, यानि सारे जलप्रपातों का असली सौंदर्य बारिश के मौसम में ही निखर कर सामने आता है। गर्मी के दिनों में तो ये अस्सी-नब्बे फीसदी तक सूख जाते है, फिर भी जाड़े के मौसम में बहुत हद तक इनमें जान बाकी रहती है और सारे के सारे प्रपात उस समय पिकनिक स्पॉट का रूप धारण कर लेते हैं। मेरे हिसाब से इन्हें जुलाई-अगस्त के महीने में देखना सबसे अच्छा तो है, लेकिन बारिश की वजह से सड़कों की हालत परेशानी का कारण भी बन सकती है। इसी कारण हुंडरू जाने की योजना मैंने बारिश के ठीक बाद अक्टूबर 2016 में बनायी।

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            वर्तमान में मेरा प्रवास जमशेदपुर में है और हुंडरू तक जाने के लिए कम से कम डेढ़ सौ किमी की दूरी तय करनी पड़ेगी। अगर रांची होकर जाऊँ तो एक सौ सत्तर किमी की दूरी तय करनी पड़ेगी। वैसे जाने के लिए तो बहुत सारे रास्ते है। झारखण्ड की लाइफलाइन कही जाने वाली सबसे बड़ी हाईवे संख्या 33 की स्थिति वर्षों से खराब है और यही बाइकिंग में भी सबसे बड़ी बाधा भी। जमशेदपुर से सटे हुए आदित्यपुर में भी एक समय रास्ते बहुत खराब हुआ करते थे, लेकिन आज स्थिति कुछ और ही है। इस एक्सप्रेस हाईवे को पकड़ कर मैं करीब तीस किमी की दूरी तय करके चांडिल नामक छोटे से कस्बे में पहुँचता हूँ, इस प्रकार कुछ देर तक NH 33 बाईपास करके छुटकारा तो मिल गया, पर चांडिल में फिर से मुझे NH 33 मुँह चिढ़ाने लगता है।

                   चांडिल से या तो NH 33 पकड़ सीधे रांची जाया जा सकता है या फिर एक और बाईपास सड़क जो  कुछ देर तक पश्चिम बंगाल से गुजरेगी और सत्तर किमी दूर मुरी ले चलेगी। यह रांची-पुरुलिया मुख्य मार्ग है और इसकी स्थिति काफी अच्छी है। मुरी का नाम शायद आपने पहले भी सुना हो, एल्युमीनियम उद्योग (हिंडाल्को) के लिए प्रसिद्द है। एल्युमीनियम अयस्क गिरने के कारण यहाँ की भूमि कही-कहीं लाल दिखाई पड़ती है। मुरी से उत्तर दिशा में रांची पुरुलिया रोड पर ही जोन्हा एवं हुंडरू– दोनों प्रपातों के रास्ते खुलते हैं। बीस किमी बाद बाएं मुड़ने पर जोन्हा का रास्ता है, जबकि तीस किमी बाद दाएं मुड़ने पर हुंडरू का। दोनों प्रपातों के मध्य सिर्फ तीस किमी का ही फासला है। लेकिन एक ही दिन दोनों का दीदार ढंग से कर पाना बहुत मुश्किल है। इधर सड़कें बिल्कुल चकाचक है, दोनों तरफ हरियाली है।

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झारखण्ड के अधिकतर जलप्रपातों के चारों ओर मुख्यतः पलास के जंगल पाए जाते हैं। हुंडरू फॉल झारखण्ड के सबसे बड़े जलप्रपातों में से एक है और इसकी ऊंचाई करीब 320 फ़ीट है। वैसे झारखण्ड का सबसे ऊँचा प्रपात नेतरहाट से 70 किमी दूर स्थित लोध फाल्स है,लेकिन दुर्गम होने के कारण वह अधिक प्रसिद्द नहीं हो पाया है, हुंडरू ही झारखण्ड के सबसे ऊँचे प्रपात रूप विख्यात है। रांची के पास से निकलने वाली स्वर्णरेखा नदी जब उबड़-खाबड़ पठारी मार्गों से गुजरते हुए ओरमांझी नामक स्थान के आस-पास एक पहाड़ी से गिरती है, तब इस प्रपात का निर्माण होता है। ऊंचाई के मामले में हुंडरू देश का चौंतीसवाँ सबसे ऊँचा प्रपात है।

अक्टूबर के महीने में यहाँ भीड़ कोई खास तो नहीं  थी, फिर भी पर्यटकों की संख्या को नजरअंदाज नहीं किया सकता था। झारखण्ड का एक महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र होने के कारण यहाँ वाहन पार्किंग, प्रसाधन, जलपान वगैरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। प्रवेश टिकट के नाम पर पांच रूपये की मामूली फीस वसूली जाती है। दशमफाल की तरह ही यहाँ भी प्रपात के पास जाने के लिए हजारों सीढ़ियों से होते हुए नीचे जाना पड़ता है। बीच-बीच में कुछ स्थानीय बच्चे बांस और लकड़ी के बने कुछ कलाकृतियां बेचते हुए नजर आते हैं। अगर दस-बीस रूपये का भी कुछ इनसे खरीद लिया जाय, तो उनके चेहरे पर ख़ुशी स्पष्ट झलक आती है।

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                नीचे तक पहुंचने में लगभग पंद्रह मिनट का वक़्त लगा, वापस चढ़ने में भी निश्चित रूप से इससे अधिक वक़्त लगेगा। जलप्रपात की धारा अभी कुछ मध्यम सी थी, फिर भी नज़ारे सुंदर थे। जिस स्थान पर पानी की धारा गिरती है, वहां एक छोटे से प्राकृतिक तरण -ताल का निर्माण हो गया है, जिसमें डुबकी भी लगाया जा सकता है। अगर आप थक गए हों तो लकड़ी के बने एक छोटे से झोपडी में आराम फरमाते हुए प्रपात का आनंद ले सकते हैं। एक बात यहाँ अच्छी लगी की हुंडरू अधिक ऊँचा होने के बावजूद दशमफाल जैसा खतरनाक नहीं है। दशमफाल में आये दिन अनेक दुर्घटनाओं की खबरें आती रहती हैं।

कुछ घंटों की मस्ती और फोटोग्राफी कर फिर से ऊपर चढ़ने का वक़्त आ गया। इस बार चढ़ने में पच्चीस मिनट का वक़्त लगा। हुंडरू के साथ बिताये पलों को याद करते हुए अब वापस घर की ओर….

हुंडरू फॉल की कुछ यादें:—

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11 thoughts on “हुंडरू जलप्रपात: झारखण्ड का गौरव (Hundru Waterfalls: The Pride of Jharkhand)

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-06-2017) को
    "प्रश्न खड़ा लाचार" (चर्चा अंक-2640)
    पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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