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Showing posts from November, 2015

गोवा के कुछ ऐतिहासिक पन्ने (Goa Part III)

क्या गोवा का नाम सुनते ही आपके मन में सिर्फ नारियल पेड़ और समुद्र तटों का ही ख्याल आता है? गोवा का एक अन्य ऐतिहासिक पहलु भी है जिसे आप वहां की गिरिजाघरों और स्मारकों में महसूस कर सकते हैं। लगभग 450 वर्षों तक पुर्तगाली साम्राज्य रहने के यहाँ अनेक गवाह मौजूद हैं। सबसे पहले आपको ले चलूँगा फोर्ट अगोड़ा (Fort Aguada) । फोर्ट मतलब किला और  ट्रेन की हेराफेरी जिसने दिया हमें पहली उड़ान का आपातकालीन  मौका..मौका…(Goa Part I) गोवा के कुछ मनोहारी समुद्रतट (Goa Part II) गोवा के कुछ ऐतिहासिक पन्ने (Goa Part III) आईये जानें आखिर कैसी होती है गोवा की नशीली शाम (Goa Part IV) गोवा के कड़वे अनुभव (Shock at Vagatore Beach, Goa ) अगोडा मतलब  पानी। 17 वीं सदी में अरब सागर के सिंक्वेरियम तट पर बना यह किला मराठों और डचों से बचने के लिए मांडवी नदी के उद्गम पर ही बनवाया गया था।  अभी भी यह अच्छी अवस्था में है और पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है।         गिरिजाघरों की बात अगर की जाय तो आईये ओल्ड गोवा में। 15वीं सदी में निर्मित संत कैथेड्रल चर्च एशिया का सबसे बड़ा चर्च है। इसी परिसर में एक पुरातत्व संग्रहा

गोवा के कुछ मनोहारी समुद्रतट (Goa Part II)

तो खैर ट्रेन की हेराफेरी के बाद पहली उड़ान के दम पर हम मुंबई आये और बस मार्ग से गोवा की ओर रवाना हुए। पुरे रास्ते भर नारियल पेड़ों का सौंदर्य और हरियाली देखकर तो चित्त प्रसन्न हो उठा। मन ही मन इन्ही नारियल पेड़ों को देखकर गोवा की एक काल्पनिक छवि दिलो-दिमाग में उभर कर आ रही थी। 14 घंटे लम्बी बस यात्रा कर हम सुबह दस बजे गोवा पहुंचे। जल्दी जल्दी अपने होटल की ओर प्रस्थान किया, जानकारी ली और निकल पड़े सबसे पहले तट अंजुना   की ओर। गोवा में आपको घूमने के लिए स्कूटी या मोटरसाइकिल भाड़े पर मिल जायेंगे। तो बस लीजिये और हो जाइए फुर्रर।  जिंदगी में पहली बार दूर से ही समुद्र की नीलिमा देखकर हम  चिल्ला उठे उउउउहुउउउउ! क्या नजारा था! ट्रेन की हेराफेरी जिसने दिया हमें पहली उड़ान का आपातकालीन  मौका..मौका…(Goa Part I) गोवा के कुछ मनोहारी समुद्रतट (Goa Part II) गोवा के कुछ ऐतिहासिक पन्ने (Goa Part III) आईये जानें आखिर कैसी होती है गोवा की नशीली शाम (Goa Part IV) गोवा के कड़वे अनुभव (Shock at Vagatore Beach, Goa ) चांदी जैसा बालू और नीलम जैसा पानी! ऊपर से नारियल की हरियाली एवं विदेशी सैलानियों की एक

ट्रेन की हेराफेरी जिसने दिया हमें पहली उड़ान का आपातकालीन मौका..मौका…(Goa Part I)

 आज मैं आपसे बयाँ करने जा रहा हूँ एक ऐसी जमीनी हेराफेरी की,  जिसने हमें पहली बार आसमान में उड़ने का मौका दिया। बात पांच साल पहले की है जब मैंने घूमना शुरू किया था। मेरे एक दोस्त अरुण के साथ गोवा जाने का कार्यक्रम तय हुआ। जाना ट्रेन से ही था, मुम्बई होते हुए, फिर  मुम्बई से गोवा जाने का कुछ तय नही था, बस या ट्रेन। हावड़ा मुम्बई मुख्य लाइन पर ही टाटानगर स्थित है इसीलिए टाटा से मुम्बई तक ट्रेनों की भरमार है।  लेकिन साथ ही नक्सल प्रभाव के कारण एक से एक काण्ड भी हुए हैं। अक्सर इधर पटरियां उड़ा दी जाती हैं। 19 मई 2010 को टाटा हावड़ा मार्ग पर ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हुई थी जिससे  लगभग डेढ़ साल से अधिक समय तक रात्रि में ट्रेन चलना बंद था।  हावड़ा से मुम्बई छूटने वाली सारी रात्रि ट्रेनों को सुबह चार बजे रवाना किया जाता था। इस तरह सारी ट्रेनें आठ दस घंटे लेट रहती थी।                                      हमें जाना था हावड़ा मुम्बई मेल से जो सामान्यतः अपने समय सारिणी अनुसार 12 बजे रात को टाटा पहुचती थी। लेकिन उस दौर में उसे सुबह साढ़े आठ बजे पहुचना था। 20 फ़रवरी 2011 का टिकट आरक्ष