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Showing posts from March, 2016

पतरातू घाटी: झारखण्ड की एक अनोखी घाटी ( Patratu Valley, Ranchi)

ठण्ड का मौसम, सुबह की चमकती धुप, हलकी-हलकी चलती सर्द हवाएं, सर्पीले रास्ते, घाटियाँ, ऊँची-नीची पहाड़ियां, वक्रनुमा पानी का किनारा - इन शब्दों का प्रयोग मैं किसी हिमालयी क्षेत्र की ओर इशारा करने के लिए नहीं कर रहा, बल्कि अपने ही राज्य झारखण्ड के बारे बता रहा हूँ। सच तो यह है की दूर का ढोल सुहावन होने के कारण अक्सर हम नजदीकी नजारों को कोई महत्व नहीं देते हैं, और फलस्वरूप आस पास के बारे ज्यादा नहीं जान पाते। झारखण्ड में राँची से उत्तर की ओर 35 किलोमीटर दूर की एक घाटी इसी प्रकार के अछूते प्राकृतिक सौंदर्य का शानदार उदाहरण है। पतरातू घाटी - एक नजर    जमशेदपुर से राँची होते हुए 165 किलोमीटर दूर पतरातू घाटी की सैर करने के लिए पहले तो मैंने अपनी बाइक से ही जाने का निश्चय किया था, लेकिन बाद में इस कार्यक्रम को जरा पारिवारिक विस्तार देकर एक रात रांची में ही गुजार लेना ठीक समझा। लम्बे अरसे बाद राँची की ओर जाने का कार्यक्रम बन रहा था, जमशेदपुर से शाम की बस पकड़ कर 130 किलोमीटर दूर राँची आ गए। समुद्र तल से जमशेदपुर सिर्फ 450 फीट की ऊंचाई पर है, जबकि राँची 2100 फीट पर, इसीलिए दिसम्बर के आखिर

पारसनाथ: झारखण्ड की सबसे ऊँची चोटी (Parasnath Hills, Jharkhand)

झारखण्ड न सिर्फ खनिज-खदानों से भरा पड़ा है, बल्कि यहाँ भी एक से बढ़कर एक अछूते रमणीय स्थल मौजूद हैं, जो की पर्यटन के लिहाज से अब तक अधिक विकसित नहीं हो पाएं हैं।  कल्पना कीजिये की अपने ही राज्य में अगर एक ऐसी जगह हो, जहाँ दिन की दुपहरिया में भी बादल पर्वतों को छूते नजर आएं और शाम ढलते ही बरसकर सारी फ़िज़ा को तरो -ताज़ा बना दे, तो फिर क्या दार्जिलिंग और क्या शिमला, सब इधर ही खींचे चले आएंगे।  जिसका आज जिक्र करूँगा वह भी एक हिल स्टेशन के तौर पर अब तक देशवाशियों तो क्या, स्थानीय लोगों के लिए भी अछूता ही है, लेकिन हाँ, जैनियों का तीर्थ जरूर है जहाँ देश के कोने कोने से वे अपने तीर्थंकरों का दर्शन करने आते हैं, और वो है झारखण्ड की 4500 फ़ीट पर सबसे ऊँची चोटी- पारसनाथ की पहाड़ी। जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ , जिन्होंने कुछ हजार बर्षों पहले अपने बीस  साथी संतों के साथ यहाँ समाधी ली और उन्ही के नाम पर इसका नाम पड़ा पारसनाथ । जैन धर्म के सबसे पहले तीर्थंकर थे ऋषभ मुनि और चौबीसवें एवं अंतिम थे महावीर । यही कारण है की पारसनाथ जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों में से एक है।

नेपाल से वापसी- बनारस में कुछ लम्हें (Banaras- Nepal IV)

पिछले पोस्टों में आपने पढ़ा - पहले जमशेदपुर से काठमांडू तक की बस यात्रा, फिर काठमांडू से लेकर पोखरा तक के दिलकश नज़ारे। इन चार पांच दिनों में मन इस हिमालयी देश में पूरी तरह रम चुका था। क़भी भी यह महसूस ही नहीं हुआ की हम किसी दूसरे देश में घूम रहे हैं, बल्कि सबकुछ अपने देश जैसा ही था वहां। वक़्त भी अब वापसी का हो चला था और पोखरा से विदा लेने की बारी आ गयी। इस बार हमने भारत-नेपाल के एक अन्य सीमा सनौली बॉर्डर जो जमशेदपुर से नेपाल (काठमांडू) तक की बस यात्रा (Jamshedpur to Nepal By Bus) काठमांडू के नज़ारे- पशुपतिनाथ, बौद्धनाथ, भक्तपुर दरबार और नागरकोट- नेपाल भाग -2 (Kathmandu- Nepal Part-II) काठमांडू से पोखरा- सारंगकोट, सेती नदी, गुप्तेश्वर गुफा और फेवा झील (Pokhara- Nepal Part-III) नेपाल से वापसी- बनारस में कुछ लम्हें (Banaras- Nepal IV)  गोरखपुर के समीप है,  से होते हुए वापस जाने का निर्णय लिया। पोखरा से सनौली बॉर्डर तक जाने में पांच-छह घंटे का समय लगा। फिर सनौली से गोरखपुर दो घण्टे का रास्ता था। वापसी यात्रा बिलकुल ही अनियोजित थी इसिलिए जगह जगह हमें स्टेशन बदल बदल कर जाना था। शाम क