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Showing posts from July, 2017

पूर्वोत्तर भारत: इनर लाइन परमिट कैसे प्राप्त करें? (How to Obtain Inner Line Permit for North East India)

यूँ तो अपने देश में एक नागरिक को किसी भी राज्य या भूभाग में बिना किसी रोक-टोक के स्वछन्द यात्रा करने की अनुमति संविधान के द्वारा प्राप्त है, फिर भी बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है की देश के कुछ संवेदनशील इलाके ऐसे भी हैं जहाँ एक आम नागरिक को पहुँचने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता होती है। यह अनुमति उस क्षेत्र या प्रान्त के स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी की जाती है। अब तक की गयी यात्राओं में मैंने पाया की सिक्किम के युमथांग घाटी और नाथुला दर्रे और अंडमान निकोबार के कुछ हिस्सों के लिए भी ऐसी परमिट की जरुरत पड़ती है। पहले जम्मू और कश्मीर के लेह जिले के कुछ हिस्सों के लिए भी परमिट आवश्यक था। इस आवश्यकता को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए एक परिपत्र द्वारा समाप्त कर दिया गया, जो 1 मई 2014 से प्रभावी हुआ, हालांकि विदेशी नागरिकों को इस क्षेत्र के लिए संरक्षित क्षेत्र परमिट प्राप्त करना आवश्यक है। पूर्वोत्तर भारत के तीन राज्यों- अरुणाचल, नागालैंड और मिजोरम के लिए भी ऐसे ही परमिट की जरुरत पड़ती है, फर्क सिर्फ इतना है की इन राज्यों में सम्पूर्ण तौर पर कहीं भी जाने के लिए परमिट क

क्यों बनें घुमक्कड़? (Why To Be A Traveller)

घुमक्कडी या घूमना जिसे आम तौर पर लोग महज एक शौक के रूप में ही देखते हैं, वास्तव में यह इससे कहीं बढ़कर है। आम तौर पर घूमने वाले दो किस्म के होते हैं। एक साधारण पर्यटक होते है, छुट्टी लेकर साल में एकाध बार किसी यात्रा पर निकलते हैं। और एक वे होते हैं जिनका घूमना जूनून होता हैं। वे किसी नियम या कार्यक्रम में बिना बंधे हुए अकस्मात् कभी भी कहीं भी निकल सकते हैं। घुमक्कड़ प्रायः कम और सिमित संसाधनों में ही यात्रा करते हैं, जबकि पर्यटक सुख सुविधाओं से लैस होकर। वैसे पर्यटक और घुमक्कड़ के बीच क्या अंतर है,  यह तो एक बहुत बड़ा विषय है जिसपर काफी लंबा लिखा जा सकता है।  लेकिन सवाल यह है की आखिर घूमने की जरुरत ही क्या है? अगर पैसे खूब हैं तो आराम से घर में सारे भोग विलास के साधन जुटा कर मजे की ज़िन्दगी काटी जा सकती है। फिर क्या जरुरत है घर से बाहर निकल कर परेशानी उठाने की? यात्रा का जोखिम उठाने की? बस, रेल या हवाई जहाज सब जगह जोखिम ही जोखिम तो है! आज का दौर तो दुर्घटनाओं का दौर है भाई, फिर क्यों न घर में ही "सुरक्षित" रह लिया जाय? आखिर क्यों यह पोस्ट लिखने को मैं आज मजबूर हुआ?

मुकुटमणिपुर बांध (Mukutmanipur Dam: Second largest earthen dam of India)

नदियों पर बांधों का निर्माण तो वैसे बहुत सारे उद्देश्यों के लिए किया जाता है, फिर भी इनके पीछे औद्योगिक कारण ही प्रधान होते हैं। कुछ बांध तो इतने खास बन जाते हैं की अनायास ही इनसे कब पर्यटन जुड़ जाता है, पता नहीं चलता। भारत के सबसे बड़े बांधों में टिहरी, भाखड़ा-नागल, हीराकुड, नागार्जुन-सागर  आदि पहले से ही काफी प्रसिद्द हैं, और पर्यटकों को काफी लुभाते भी हैं, जबकि इनमें से किसी का भी निर्माण कदाचित पर्यटन हेतु नहीं किया गया होगा। दूसरी ओर इन बांधों के पीछे एक अन्य पहलू भी होता है, प्रकृति के साथ किये गए छेड़ -छाड़ से उत्पन्न पर्यावरण संम्बधी गंभीर समस्या जिनकी चर्चा आजकल खूब होने लगी है। कुछ बांध ऐसे भी हैं जिनके पीछे उन विस्थापितों का दर्द छुपा होता है जिनके आशियाने हमेशा के लिए जलमग्न हो गए और आज तक मदद के लिए सरकार से संघर्ष करते आ रहे हैं। खैर, जो भी हो इस दिशा में मैं ज्यादा नहीं बढ़ना चाहूंगा, ले चलता हूँ आपको झारखण्ड-बंगाल सीमा के नजदीक भारत के एक और महत्वपूर्ण बांध की ओर जिसका नाम बहुत कम लोगों ने ही सुन रखा होगा।                           मेरे निवास स्थल जमशेदपुर से पश्चिम